<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822</id><updated>2012-02-17T07:21:04.359+05:30</updated><category term='आतंक'/><category term='श्रीराम-जन्मभूमि'/><category term='अन्ना हजारे का अनशन'/><category term='मधुशाला'/><category term='‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास'/><category term='साक्षात्कार'/><category term='राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'/><category term='महिला आरक्षण'/><category term='फई के बयान से फिर बेनकाब हुआ पाक'/><category term='सोनिया की चुप्पी और मनमोहन का ‘धृतराष्ट्रवाद’'/><category term='बरेली दंगा'/><category term='&apos;नेपाल&apos; शब्द की व्युत्पत्ति'/><category term='हाय रे शिबू सोरेन'/><category term='लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रबल हिमायती थे जेपी'/><category term='धर्म से निरपेक्ष कौन'/><category term='कविता'/><category term='साहित्य'/><category term='ठंडा मतलब &apos;गोकोला&apos;'/><category term='रामजन्मभूमि के संघर्ष की गौरवगाथा'/><category term='चुनाव आयोग का हास्यास्पद फैसला'/><category term='‘भगवा’ नहीं ‘हत्यावादी आतंकवाद’ कहिए चिदंबरम जी'/><category term='अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?'/><category term='साम्यवाद का बिगड़ैल पुत्र है नक्सलवाद'/><category term='राष्ट्र'/><category term='क्रिकेट का भारतीयकरण या भारतीयों का क्रिकेटीकरण?'/><category term='अयोध्या और पाकिस्तान'/><category term='मनमोहन का नेतृत्व और उसके मायने'/><category term='सौ प्याज और सौ जूते भी'/><category term='सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><category term='पर्यावरण'/><category term='गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार'/><category term='गंगा रक्षा'/><category term='गांधीवाद और गांधीत्व में बड़ा फर्क है'/><category term='&apos;राम को नकारना कठिन ही नहीं असंभव भी’'/><category term='राम मंदिर निर्माण के प्रबल पक्षधर थे नरसिंह राव'/><category term='तुष्टिकरण'/><category term='विवादित ढांचा : अंजू रिजवी (गुप्ता) के बयान झूठे'/><category term='राजनीति'/><category term='‘हिन्दू आतंकवाद’ का भूत कांग्रेस की सुनियोजित साजिश'/><category term='लोकपाल बिल बनाम लोक व तंत्र की मर्यादा'/><category term='बीटी बैगन'/><category term='‘तोता-रटंत’ राहुल के निरर्थक बोल'/><category term='नक्सली ही हैं विनायक सेन'/><category term='डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’'/><category term='विनायक सेन के बहाने......'/><category term='राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’'/><category term='अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा'/><category term='आज भी प्रासंगिक हैं गांधी के विचार'/><category term='कुटिल कणिक की राह पर दिग्विजय सिंह'/><category term='रामजन्मभूमि के स्वामित्व पर न्यायालय का फैसला सुरक्षित'/><category term='नेपाल के लिए घातक हैं माओवादी'/><category term='पूर्ण विलय के पश्चात जनमत संग्रह का औचित्य ?'/><category term='जम्मू-कश्मीर'/><category term='आदर्श पत्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय'/><category term='नानाजी देशमुख'/><category term='बोतल हॉउस'/><category term='स्थितप्रज्ञ हुए मनमोहन'/><category term='कांग्रेस का सत्य से जंग'/><category term='अयोध्या फैसले के निहितार्थ'/><category term='नरेंद्र मोदी'/><category term='लालकृष्ण आडवाणी'/><category term='कांग्रेस की विध्वंसक राजनीति'/><category term='हिंदू सम्मेलन में दिग्विजय सिंह'/><category term='अयोध्या फैसले के बाद …'/><category term='Ram-Janmbhoomi : Details of Legal Battle'/><category term='प्रेम और मानवता ही हिंदू धर्म की बुनियाद'/><category term='सत्याग्रह और गांधी जी'/><category term='संसद में कानून बनाकर ही मंदिर निर्माण संभव'/><category term='मीडिया'/><category term='भारतीय जनता वर्षों तक चुकाएगी राष्ट्रमंडल खेलों की कीमत'/><category term='इण्डोनेशिया में हिन्दू प्रभाव'/><title type='text'>भारतश्री</title><subtitle type='html'>राष्ट्र सर्वप्रथम।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>105</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-8963157519025163461</id><published>2012-01-16T15:00:00.005+05:30</published><updated>2012-01-17T14:32:02.279+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>23वें निष्कासन दिवस (19 जनवरी) पर विशेष</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आज भी अपने घरों से विस्थापित कश्मीरी हिन्दू &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;26 जनवरी को भारत अपना 63वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है लेकिन विडम्बना है कि कश्मीर के हिन्दू आज भी अपने घरों से दूर विस्थापित जीवन जीने को मजबूर हैं। केन्द्र व राज्य सरकारों की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी हिन्दुओं को अपने ही घरों से विस्थापित होना पड़ा। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी हिन्दुओं की सभ्यता व संस्कृति लगभग पांच हजार वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है। इनकी सभ्यता, संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहरों को वर्ष 1989 से ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों व अलगाववादियों द्वारा कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। कश्मीर से हिंदुओं का निर्मूलन आतंकियों तथा स्थानीय अलगाववादियों का एक प्रमुख मुद्दा रहा है, क्योंकि कश्मीरी हिन्दू अलगाववादियों की राह का सबसे बड़ा रोड़ा थे। इसी कारण शांतिप्रिय हिन्दू समुदाय आतंकियों का प्रमुख निशाना बना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;04 जनवरी 1990 को कश्मीर के एक स्थानीय अखबार ‘आफ़ताब’ ने हिज्बुल मुजाहिदीन द्वारा जारी एक विज्ञप्ति प्रकाशित की। इसमें सभी हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने के लिये कहा गया था। एक और स्थानीय अखबार ‘अल-सफा’ में भी यही विज्ञप्ति प्रकाशित हुई। विदित हो कि हिज्बुल मुजाहिदीन का गठन जमात-ए-इस्लामी द्वारा जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी व जिहादी गतिविधियों को संचालित करने के मद्देनजर वर्ष 1989 में हुआ। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आतंकियों के फरमान से जुड़ी खबरें प्रकाशित होने के बाद कश्मीर घाटी में अफरा-तफरी मच गयी। सड़कों पर बंदूकधारी आतंकी और कट्टरपंथी क़त्ल-ए-आम करते और भारत-विरोधी नारे लगाते खुलेआम घूमते रहे। अमन और ख़ूबसूरती की मिसाल कश्मीर घाटी जल उठी। जगह-जगह धमाके हो रहे थे, मस्जिदों से अज़ान की जगह भड़काऊ भाषण गूंज रहे थे। दीवारें पोस्टरों से भर गयीं, सभी कश्मीरी हिन्दुओं को आदेश था कि वह इस्लाम का कड़ाई से पालन करें। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला की सरकार इस भयावह स्थिति को नियन्त्रित करने में विफल रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीरी हिन्दुओं के मकानों, दुकानों तथा अन्य प्रतिष्ठानों को चिह्नित कर उस पर नोटिस चस्पा कर दिया गया। नोटिसों में लिखा था कि वे या तो 24 घंटे के भीतर कश्मीर छोड़ दें या फिर मरने के लिये तैयार रहें। आतंकियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को प्रताड़ित करने के लिए मानवता की सारी हदें पार कर दीं। यहां तक कि अंग-विच्छेदन जैसे हृदयविदारक तरीके भी अपनाए गये। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह थी कि किसी को मारने के बाद ये आतंकी जश्न मनाते थे। कई शवों का समुचित दाह-संस्कार भी नहीं करने दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19 जनवरी 1990 को श्री जगमोहन ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल का दूसरी बार पदभार संभाला। कश्मीर में व्यवस्था को बहाल करने  के लिये सबसे पहले कर्फ्यू लगा दिया गया लेकिन यह भी आतंकियों को रोकने में नाकाम रहा। सारे दिन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) और हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी आम लोगों को कर्फ्यू तोड़ सड़क पर आने के लिए उकसाते रहे। विदित हो कि राज्य में 19 जनवरी से 9 अक्टूबर 1996 तक राष्ट्रपति शासन रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तत: 19 जनवरी की रात निराशा और अवसाद से जूझते लाखों  कश्मीरी हिन्दुओं का साहस टूट गया। उन्होंने अपनी जान बचाने के लिये अपने घर-बार तथा खेती-बाड़ी को छोड़ अपने जन्मस्थान से पलायन का निर्णय लिया। इस प्रकार लगभग 3,50,000 कश्मीरी हिन्दू विस्थापित हो गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले जेकेएलएफ ने भारतीय जनता पार्टी के नेता पंडित टीकालाल टपलू की श्रीनगर में 14 सितम्बर 1989 को दिन-दहाड़े हत्या कर दी। श्रीनगर के न्यायाधीश एन.के. गंजू की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। इसके बाद क़रीब 320 कश्मीरी हिन्दुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी जिसमें महिला, पुरूष और बच्चे शामिल थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्थापन के पांच वर्ष बाद तक कश्मीरी हिंदुओं में से लगभग 5500 लोग विभिन्न शिविरों तथा अन्य स्थानों पर काल का ग्रास बन गये। इनमें से लगभग एक हजार से ज्यादा की मृत्यु 'सनस्ट्रोक' की वजह से हुई; क्योंकि कश्मीर की सर्द जलवायु के अभ्यस्त ये लोग देश में अन्य स्थानों पर पड़ने वाली भीषण गर्मी सहन नहीं कर सके। क़ई अन्य दुर्घटनाओं तथा हृदयाघात का शिकार हुए।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विडंबना ही है कि इतना सब होने के बावजूद इस घटना को लेकर शायद ही कोई रिपोर्ट दर्ज हुई हो। यदि यह घटना एक समुदाय विशेष के साथ हुई होती तो केन्द्र व राज्य सरकारें धरती-आसमान एक कर देतीं। मीडिया भी छोटी से छोटी जानकारी को बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करता। लेकिन चूंकि पीड़ित हिंदू थे इसलिये न तो कुछ लिखा गया, न ही कहा गया। सरकारी तौर पर भी कहा गया कि कश्मीरी हिन्दुओं ने पलायन का निर्णय स्वेच्छा से लिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक सतही जांच के बाद सभी तथ्यों को ताक पर रख इस घटना को नरसंहार मानने से साफ इन्कार कर दिया। जबकि सत्यता यह थी कि सैकड़ों महिला, पुरुष और बच्चों की नृशंस हत्या हुई थी।  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;भारत का संविधान देश में किसी भी व्यक्ति को जाति, मजहब, भाषा और प्रांत के आधार पर विभाजित किये बिना सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। कश्मीरी पंडितों का पलायन क्या इस अधिकार का हनन नहीं है? केवल सरकार ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर के मनवाधिकार संगठन भी इस मामले पर मौन रहे। विख्यात अंतरराष्ट्रीय संगठनों; जैसे- एशिया वॉच, एम्नेस्टी इंटरनेशनल तथा कई अन्य संस्थाओं में इस मामले पर सुनवाई आज भी लम्बित है। उनके प्रतिनिधि अभी तक दिल्ली, जम्मू तथा भारत के अन्य राज्यों में स्थित उन विभिन्न शिविरों का दौरा नहीं कर सके हैं जहां कश्मीरी हिन्दुओं के परिवार शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन कश्मीरी विस्थापितों की दुर्दशा राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से आज दलों के लिए सेल्फ रूल, स्वायत्तता और अफस्पा हटाना ही प्रमुख मुद्दा है। यह भी कम आश्चर्य नहीं कि निष्कासन के 22 वर्षों बाद भी इन हिन्दुओं की सुनने वाले कुछ लोग ही हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-8963157519025163461?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/8963157519025163461/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=8963157519025163461&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8963157519025163461'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8963157519025163461'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2012/01/23-19.html' title='23वें निष्कासन दिवस (19 जनवरी) पर विशेष'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-9050339279752403735</id><published>2012-01-11T20:01:00.003+05:30</published><updated>2012-01-11T20:06:24.195+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनाव आयोग का हास्यास्पद फैसला'/><title type='text'>चुनाव आयोग का हास्यास्पद फैसला</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बसपा&lt;/span&gt; सुप्रीमो कुमारी मायावती और हाथी की मूर्तियों को ढंकवाने के बाद चुनाव आयोग समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल का क्या करेगा? साइकिल आमजन की सवारी है, जो हर नगर, ग्राम, डगर-डगर दिख जायेगी। तो क्या चुनाव सम्पन्न होने तक लोग साइकिल की सवारी करना छोड़ दें? साइकिल के दुकानदारों को चाहिए कि वे अपनी-अपनी दुकानें भी बंद कर दें! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस का चुनाव चिन्ह पंजा है, तो क्या कांग्रेसी उम्मीदवार अपने हाथों में दास्ताने पहनकर प्रचार के लिए जनता के बीच निकलेंगे? लालू यादव की राजद का चुनाव चिन्ह लालटेन है, जो अंधेरे का साथी है। क्या चुनाव आयोग रात में जलने वाले लालटेनों पर भी पर्दा डाल देगा? दुकानों में लालटेन की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा देना चाहिए।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-0WEszZT9ovw/Tw2d_3z41aI/AAAAAAAAAvg/_stzZDKr1rQ/s1600/BSP.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 226px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-0WEszZT9ovw/Tw2d_3z41aI/AAAAAAAAAvg/_stzZDKr1rQ/s320/BSP.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696382824332449186" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भारतीय जनता पार्टी&lt;/span&gt; का चुनाव चिन्ह कमल का फूल है। कमल के फूल को लोग मंदिरों में भी चढ़ाते हैं। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह चुनाव सम्पन्न होने तक मंदिरों में कमल के फूल को प्रतिबन्धित कर दे। जो लोग कमल की खेती करते हैं, उन पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए! और कमल की खेती वाले जलाशयों को ढंकवाने का भी प्रबन्ध करना चाहिए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चुनाव आयोग का यह फैसला बसपा के खिलाफ है या पक्ष में, या फिर आदर्श चुनाव आचार संहिता के हित में, इस पर भ्रम है; लेकिन इतना स्पष्ट है कि ढंकी हुई मूर्तियां जनता का ध्यान ज्यादा आकृष्ट करेंगी। इससे मायावती और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी का तो बिना प्रयास ही जबर्दश्त प्रचार हो रहा है। यह आज के लगभग सभी समाचार पत्रों की लीड न्यूज है। बिना प्रयास भरपूर प्रचार हो रहा है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, इन मूर्तियों को ढंकने का फैसला चुनाव आयोग ने खुद आगे आकर नहीं किया है। उसके पास मायावती विरोधी दलों ने शिकायत की थी। इस शिकायत में केंद्र की कांग्रेस-नीत यूपीए के कुछ घटक दल भी शामिल थे। चुनाव आयोग पर उसका कितना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव पड़ा होगा, यह तो बाद की बात है लेकिन फैसला तो केवल मायावती और उनकी हाथी के खिलाफ हुआ।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल, मायावती और हाथी की मूर्तियों को ढंकवाने का चुनाव आयोग का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, हास्यास्पद भी। इन मूर्तियों को लगवाने में जनता का ही पैसा खर्च हुआ और अब ढंकवाने में भी हो रहा है। यानी दोहरा खर्च। चुनाव आयोग को यदि निर्णय लेना ही था तो उन मूर्तियों को तोड़वाने का लेना चाहिए था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-9050339279752403735?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/9050339279752403735/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=9050339279752403735&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/9050339279752403735'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/9050339279752403735'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html' title='चुनाव आयोग का हास्यास्पद फैसला'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-0WEszZT9ovw/Tw2d_3z41aI/AAAAAAAAAvg/_stzZDKr1rQ/s72-c/BSP.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3261500217767827991</id><published>2012-01-07T14:36:00.011+05:30</published><updated>2012-01-10T14:30:36.683+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदू सम्मेलन में दिग्विजय सिंह'/><title type='text'>कट्टर हिंदू हैं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह</title><content type='html'>नीचे दिये गये चित्र 21 अक्टूबर 1997 में हरिद्वार में हुए विराट हिंदू सम्मेलन के हैं। इस कार्यक्रम के मंच पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कांग्रेस महासिचव व मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह&lt;/span&gt; भी उपस्थित थे। श्री सिंह मंच पर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया&lt;/span&gt; और विहिप अध्यक्ष &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अशोक सिंहल&lt;/span&gt; के बीच में बैठे थे। मंच पर कांचि कामकोटि पीठ के शंकाराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती और नेपाल के तत्कालीन राजा व रानी भी उपस्थित थे। 65 वर्षीय श्री दिग्विजय सिंह 1993 से 2003 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-UdQXT4rP8LA/TwgStczRsSI/AAAAAAAAAuM/PUismyx2B88/s1600/scan0003.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 302px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-UdQXT4rP8LA/TwgStczRsSI/AAAAAAAAAuM/PUismyx2B88/s400/scan0003.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694822300844667170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-8qmcZv9owcY/TwgTqlUhc1I/AAAAAAAAAuY/YRNQzuGPYSM/s1600/scan0004.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 301px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-8qmcZv9owcY/TwgTqlUhc1I/AAAAAAAAAuY/YRNQzuGPYSM/s400/scan0004.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694823351103615826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-LYlJ5rG0fXY/TwgUHry_g4I/AAAAAAAAAuk/rkunIE54tyU/s1600/scan0005.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 295px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-LYlJ5rG0fXY/TwgUHry_g4I/AAAAAAAAAuk/rkunIE54tyU/s400/scan0005.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694823851058234242" /&gt;&lt;/a&gt;स्वामी जयेन्द्र सरस्वती का चरण छूकर आशीर्वाद लेते दिग्विजय सिंह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-UB008fdMMFM/TwgWOKzw2RI/AAAAAAAAAu8/YoHU1plmghU/s1600/scan0007.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 296px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-UB008fdMMFM/TwgWOKzw2RI/AAAAAAAAAu8/YoHU1plmghU/s400/scan0007.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694826161485437202" /&gt;&lt;/a&gt;नेपाल के तत्कालीन नरेश का अभिवादन करते दिग्विजय सिंह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-n0i_tdcaX5E/TwgVlHRFhFI/AAAAAAAAAuw/QblKBjy5Z_A/s1600/scan0006.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 292px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-n0i_tdcaX5E/TwgVlHRFhFI/AAAAAAAAAuw/QblKBjy5Z_A/s400/scan0006.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694825456160048210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-e7QvR7aF4tQ/TwgXVEjOjwI/AAAAAAAAAvI/oLYhqGuh2cE/s1600/scan0008.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 290px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-e7QvR7aF4tQ/TwgXVEjOjwI/AAAAAAAAAvI/oLYhqGuh2cE/s400/scan0008.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694827379576180482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-d1bqQpIsJmI/TwgX73uQacI/AAAAAAAAAvU/DZpOjbKCaeg/s1600/scan0009.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 293px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-d1bqQpIsJmI/TwgX73uQacI/AAAAAAAAAvU/DZpOjbKCaeg/s400/scan0009.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694828046147676610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-Ywz1a3pzQws/TwgNQI9qvXI/AAAAAAAAAuA/9CFfKNCWifc/s1600/scan0002.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 231px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-Ywz1a3pzQws/TwgNQI9qvXI/AAAAAAAAAuA/9CFfKNCWifc/s320/scan0002.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694816299745197426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-5PTV9SWmJTc/TwgL0meH7uI/AAAAAAAAAt0/MpfXURrGMxM/s1600/scan0001.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-5PTV9SWmJTc/TwgL0meH7uI/AAAAAAAAAt0/MpfXURrGMxM/s320/scan0001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5694814727117991650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3261500217767827991?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3261500217767827991/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3261500217767827991&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3261500217767827991'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3261500217767827991'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='कट्टर हिंदू हैं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-UdQXT4rP8LA/TwgStczRsSI/AAAAAAAAAuM/PUismyx2B88/s72-c/scan0003.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4739219241840045549</id><published>2011-12-29T19:33:00.008+05:30</published><updated>2011-12-31T17:54:58.076+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्र'/><title type='text'>सार्वलौकिक और सार्वकालिक ग्रन्थ है भगवद्गीता</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;रूस की अदालत ने भगवद्गीता के रूसी भाषा में अनूदित संस्करण 'भगवत् गीता एस इट इज' पर रोक लगाने और इसके वितरण को अवैध घोषित करने की याचिका 28 दिसम्बर को खारिज कर दी। इसके अनुवादक इस्कान के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद हैं। इसके प्रकाश में आने के बाद से ही कुछ ईसाई संगठनों ने खिलाफत का झंडा उठा लिया था। रूस के शक्तिशाली आर्थोडॉक्स चर्च का कहना था कि यह जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘मीन कांफ’ से कम नहीं है। चर्च से जुड़े एक संगठन ने जून में इसके खिलाफ साइबेरिया प्रांत के तोमस्क शहर की अदालत में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि यह उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देती है। अदालत ने महीनों चली सुनवाई के बाद 19 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने 28 दिसम्बर के रूसी अदालत के फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि रूसी अदालत में दायर याचिका कुछ सनकी लोगों की दिमागी उपज थी। विगत दिनों इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में काफी हंगामा हुआ था। रूसी अदालत के फैसले की सूचना भारत सरकार ने भी लोकसभा को दी। लोकसभा में नेता सदन एवं वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने अधिकृत रूप से 29 दिसम्बर को बताया कि रूसी अदालत ने भगवद्गीता के अनूदित संस्करण पर प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया है। प्रणव की सूचना का सभी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर स्वागत किया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, भगवद्गीता में विरोध लायक कुछ नहीं है। रूस में जो लोग इसका विरोध कर रहे थे, उनकी पृष्ठभूमि सर्वविदित है। भगवद्गीता के संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास ने इसे मानवमात्र का धर्मशास्त्र कहा है। उन्होंने इसे सारे वेदों के प्राण और उपनिषदों का भी सार बताया है। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादार है फिर भी यह किसी सम्प्रदाय या मजहब का ग्रन्थ नहीं बन सका; क्योंकि सम्प्रदाय किसी न किसी रूढ़ि से जकड़े हैं। यह किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, पन्थ या देश-काल का ग्रन्थ नहीं है बल्कि यह सार्वलौकिक व सार्वकालिक है। विश्व मनीषा की अमूल्य धरोहर है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका प्रादुर्भाव महाभारत युद्ध के दौरान हुआ। युद्धक्षेत्र ‘कुरुक्षेत्र’ में कौरव और पाण्डव पक्ष की सेना लड़ने को तैयार थी और अपने-अपने सेनापतियों के शंख फूँकने की प्रतीक्षा कर रही थीं। ठीक उसी समय पाण्डव पक्ष का मुख्य योद्धा अर्जुन अपना ‘गाण्डीव’ रथ के पिछले हिस्से में रखकर बैठ जाता है और कृष्ण से कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। युद्ध में अपने ही प्रियजनों, सगे-संबंधियों को मारकर खून से सने राज्य का भोग करने से बेहतर भिच्छा का अन्न ग्रहण करना होगा। इसलिए हे भगवन् ! कोई दूसरा उपाय बताइए। क्योंकि अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर मेरे हाथ-पांव कांप रहे हैं। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-X0X1yOKtTGc/Tvxz65y96iI/AAAAAAAAAto/-nLmdFmshYk/s1600/Krishna-Arjuna.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 282px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-X0X1yOKtTGc/Tvxz65y96iI/AAAAAAAAAto/-nLmdFmshYk/s320/Krishna-Arjuna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5691551484873665058" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करने के निमित्त उपदेश दिये थे। इस उपदेश का संकलन ही भगवद्गीता है। दरअसल, कृष्ण ने इस उपदेश का माध्यम अर्जुन को बनाया, लेकिन उनका उद्देश्य समूचे जगत को अमूल्य शिक्षा देने से था। यह युद्धक्षेत्र में दिया गया अहिंसा का अद्वितीय संदेश है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसमें संजय-धृतराष्ट्र और कृष्णार्जुन के संवाद हैं। कुल 42 श्लोंकों में संजय-धृतराष्ट्र संवाद और 658 श्लोंकों में कृष्णार्जुन संवाद का वर्णन है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से 84 श्लोंकों के माध्यम से प्रश्न किए हैं। कृष्ण ने इसका उत्तर कुल 574 श्लोंकों के माध्यम से दिये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज्ञान से आवृत्त धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से वह हस्तिनापुर राजमहल में बैठकर महाभारत युद्ध देखता व सुनता है। उसकी बातों में चिन्ता है, लेकिन पश्चाताप् का भाव नहीं है। उसको पश्चाताप् तब होता है जब सारा खेल खत्म हो जाता है। उसका रुख केवल प्रश्नवाचक है और संजय से बार-बार पूछता है कि कुरूक्षेत्र का ताजा समाचार क्या है?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्गीता का मूल श्रीकृष्णार्जुन संवाद है। इसमें वैश्विक सृष्टि के सारे निहितार्थ समाहित हैं। यह समाधानकारक ग्रन्थ है, साथ ही वैज्ञानिक भी। यह स्वयं में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ है। इसमें कहीं भी हिंदू-मुस्लिम या अन्य मत-पंथ सम्प्रदायों की चर्चा नहीं है। इसमें प्रबंधन की शिक्षा और पर्यावरण परिरक्षण का पाठ है। त्याग है, तपस्या है। सदाचार के पाठ भी समाहित हैं। घर और परिवार के संचालन की शिक्षा है। समाज में बड़ों के साथ व्यवहारगत शिक्षा का समावेश है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता का विरोध करने वाले याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह युद्ध के लिए प्रेरित करती है। हालांकि, गीता में युद्ध के लिए प्रेरित करने का सवाल ही नहीं है। यह लड़ाई तो विधर्मियों के खिलाफ थी। यदि विधर्मियों के खिलाफ लड़ना अनैतिक है, तो न लड़ना या जीवनदान देना उससे भी बड़ा अनैतिक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई व्यक्ति क्या कहता है या क्या कहना चाहता है, इसका केवल शब्दों से ही अर्थ नहीं निकाला जा सकता। श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत भाव पूर्ण रूप से केवल वाणी द्वारा ही व्यक्त नहीं किये जा सकते। वाणी द्वारा कुछ तो व्यक्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक होते हैं। इसे कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमश: चलकर उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि इसको समझने के लिए किसी योग्य पुरुष का सानिध्य आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर प्रतिबंध की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने गीता को समझने के लिए क्या किसी योग्य पुरुष की शरण ली, या फिर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ही सारे आरोप लगा दिए? हालांकि, भगवद्गीता में आस्तिकता-नास्तिकता और आस्था-अनास्था का प्रश्न ही नहीं है। यह तो समाज के सभी क्षेत्रों के प्रबंधन का पाठ है। यह देववाणी का संकलन है। कालजयी ग्रन्थ है। इस कारण इसकी प्रासंगिकता हर कालखण्ड में है। पूर्वाग्रह ही इसके विरोध की मूल प्रेरणा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4739219241840045549?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4739219241840045549/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4739219241840045549&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4739219241840045549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4739219241840045549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/12/blog-post_29.html' title='सार्वलौकिक और सार्वकालिक ग्रन्थ है भगवद्गीता'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-X0X1yOKtTGc/Tvxz65y96iI/AAAAAAAAAto/-nLmdFmshYk/s72-c/Krishna-Arjuna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3982818729318415678</id><published>2011-12-14T15:29:00.003+05:30</published><updated>2011-12-27T19:51:29.211+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>समस्या के समाधान तक उठाएंगे कश्मीर मुद्दा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-1vIOSaWQUVw/Tuhz10_7nII/AAAAAAAAAtY/bKJG0H4rNvY/s1600/Bhiayaji%2BJoshi.png"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 202px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-1vIOSaWQUVw/Tuhz10_7nII/AAAAAAAAAtY/bKJG0H4rNvY/s320/Bhiayaji%2BJoshi.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5685921898152303746" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुरेश जोशी उपाख्य भैयाजी &lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वर्ष &lt;/span&gt;1947 के पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में एक खेल मैदान पर खेलते थे, वह खेल था दिल्ली किसकी है। 1947 के बाद खेल बदला और प्रश्न आया कि कश्मीर किसका है? कश्मीर हमारा है। संघ की शाखा में स्वयंसेवकों के मन में इस भाव का जागरण बहुत पहले से ही होता आया है। समस्या है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसके बारे में संघ के स्वयंसेवकों के मन में अलग कोई भावना या विचार नहीं है, पहले से ही इस प्रकार की धारणा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर के संदर्भ में भावी परिदृश्य क्या होता है? जो भूत में था वही परिदृश्य है, वर्तमान में वही रहेगा, कोई अलग नहीं है। वर्तमान में जो है उसके कारण कुछ प्रश्न है। कश्मीर के संदर्भ में वर्तमान परिदृश्य भूतकाल का परिदृश्य नहीं है और यह वर्तमान का भी परिदृश्य देने वाल नहीं है। कश्मीर के संदर्भ में भावी परिदृश्य यही है कि जो प्रारम्भ से चला आ रहा है उसी दृष्टिकोण को देश ही नहीं बल्कि दुनिया के समक्ष सिद्ध करना, हमारा यही कार्य है। परिदृश्य के बारे में कोई दोराय नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश पर समय-समय पर विभिन्न प्रकार के आक्रमण होते आये हैं। शस्त्र लेकर आये, सारा एकदम खुला स्वरूप था आक्रमण का, ध्यान में आता है, तो लोग तैयारी करते थे आक्रमण का। पुरुषार्थ के बल पर, शक्ति के बल पर विजय प्राप्त करते हैं। तो एक बहुत लम्बी परम्परा इस देश की शक्ति ने, पुरुषार्थ ने देखी है कि किस प्रकार से शत्रुओं का सामना करना पड़ता है। शस्त्र के सामने न झुकते हुए चलते थे उसी कारण भारत का अस्तित्व विश्वमंच पर बना रहा है नहीं तो भारत समाप्त हो जाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दूसरा विभिन्न प्रकार का आक्रमण जो चला, योजना पूर्वक एक षड्यंत्र के रूप में रहा, अंग्रेजों का जो आक्रमण था वह बहुत ही सहज, हमें लगा भी नहीं कि कोई शत्रु आ रहा है, अंग्रेज हमें मित्र ही लगे। लोगों को कितनी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करायी। अगर अंग्रेज नहीं होते तो यह देश कैसे बनता, अंग्रेजों ने एक देश को देश दिया है। ऐसी भावना अच्छे-अच्छे और बुद्धिमान लोगों के मन में है। कभी-कभी लोग कहते थे कि अंग्रेजों का राज्य बहुत अच्छा था, क्या अच्छा था- तो कोई कष्ट नहीं, सुविधाएं सब प्रकार की थी, सब सम्मान मिलता था। रायबहादुर वगैरह इस प्रकार की पदवियां दी जाती थीं। समाज के संभ्रांत लोग अपने आपको धन्य मानते थे। उस समय के अंग्रेज अधिकारियों के साथ उठना-बैठना तथा चाय-पान करने को एक बड़ा गौरव मानते थे। तो शत्रु को शत्रु न समझना, यह बहुत ही कठिन स्थिति है किसी देश के लिए। अंग्रेज इस देश में कई प्रकार के बीज रोपण करके गये कि यहां का एक समान्य व्यक्ति भी भारत का दिखेगा लेकिन भारत का रहेगा कि नहीं, यह प्रश्न है। यह सामान्य अनुभव हम लोग देखते आये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वर्तमान का दृश्य जब हम देखते हैं तो दोनों प्रकार के आक्रमण हमारे देश पर चल रहे हैं। शस्त्र का सहारा लेकर आतंकवाद यहां प्रवेश कर चुका। और भी भिन्न-भिन्न प्रकार की आर्थिक शक्तियों का इस देश के जीवन में हस्तक्षेप भारत को फिर से अर्थ की दृष्टि से गुलाम बनाने में लगा हुआ है। शस्त्र का सहारा लेकर आतंकवाद के रूप में खुला आक्रमण भी चल रहा है; परन्तु दुर्भाग्य की स्थिति इस समय यह हो रही है कि इस देश में रहने वाले लोगों को ही अपने मित्र बनाकर अपने देश के साथ गद्दारी करने वाले खड़े करते गये। आतंकी घटनाएं होती हैं, मुम्बई, दिल्ली, जम्मू में होती है, या देश में कहीं और होती है, यह इसीलिए होती है क्योंकि उनको सहयोग करने वाले तत्व यहां विद्यमान हैं। यह पिछले आक्रमणों की तुलना में आया हुआ एक नया रूप है। इस देश के अंदर ही उनको सब प्रकार से सहयोग करने वाले लोग हैं। क्या अजमल कसाब बिना किसी सहयोग के ही यहां आया? केवल कसाब की ही बात नहीं है, बल्कि 26/11 में तो 10 पाकिस्तानी आतंकी समुद्री सीमा से देश में घुस आये और मुम्बई में तीन दिन तक रहकर 26/11 को अंजाम दे दिया। यह बिना किसी सहयोग के संभव ही नहीं है। यह सारा कुछ इसलिए हो रहा है कि देश के साथ गद्दारी करने वाली शक्तियां सक्रिय हैं। यह एक बड़ी समस्या है। इसके साथ हम जूझ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीमावर्ती देश पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश अपने देश में घुसपैठ कारने की कोशिश करते रहते हैं। एसे सीमावर्ती क्षेत्र पीड़ित हैं। तो ऐसी परिस्थितियां देश के अंदर हैं। देश के जो रणनीतिकार हैं उनका दायित्व बनता है कि अपने देश के लिए रणनीति बनाकर चलें। कोई नीति है क्या, इस प्रकार की नीति बनाने वाले जो लोग हैं उनकी प्रामाणिकता पर, देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह कभी-कभी लगाये जाते हैं। क्या वे प्रामाणिकता से देशहित को सामने रखकर रणनीति बनाने में लगे हुए हैं, यह सोचना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनैतिक-तात्कालिक स्वार्थ को सामने रखकर, उसको हिंदू मुस्लिम का संघर्ष बताकार उसको राजनीतिक पाले में डाल दो, यह एक बड़ी आदत है। अब कश्मीर के बारे में कोई बोलेगा, घुसपैठ और आतंकवाद के बारे में कोई बोलेगा तो वह साम्प्रदायिक है। वह इस्लाम का विरोधी है। ऐसी छवि निर्माण करने का प्रयास हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न के मूल में जाकर, उसको समझकर, समस्या निवारण के प्रति योजना या रणनीति बनाने की बजाय अपने राजनीतिक स्वार्थ को सामने रखकर क्षणिक लाभ देनेवाली बातें करते रहना, दुर्भाग्य से कुछ राजनीतिक दलों ने अपनी भूमिका इस प्रकार की बनायी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इस राष्ट्र के बारे में, देश की समस्याओं के बारे में बोलना भी राजनीतिक हो गया है, वह राष्ट्रीय नहीं रहा। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय मुद्दों को उठा रहा है तो वह राजनीतिक हो गया। क्या राष्ट्रहित से जुड़े हुए मुद्दों को जनजागरण की दृष्टि से उठाने में कोई चुनावी लाभ निहित है? किसी राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए है? ऐसे कुछ संकुचित स्वार्थ को लेकर क्या प्रश्न उठाये जाते हैं? जनसामान्य की देशभक्ति पर इस प्रकार की आशंकाएं प्रकट करना क्या देश की मानसिकता को दुर्बल करने वाला सिद्ध नहीं होगा? परन्तु इतना प्रामाणिकता से विचार करने के लिए किसके पास समय है, यह सोचने की आवश्यकता रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की शैली रही है बाचतीत करो, वार्तालाप करो, समझौता करो। यह पद्धति तो श्रेष्ठ है। इस इक्कीसवीं सदी में, आज के इस वैज्ञानिक युग में, एक विकसित मानव-जीवन के कालखंड में वार्तालाप करते हुए, गलतफहमियां दूर करते हुए, मनुष्य का जीवन सुख-शांति से चले, यह समय की मांग है। परन्तु बातचीत करने वाले को दुर्बल माना जाता है, शक्ति नहीं है तो बात करने आये हैं। जो शांति का मार्ग लेकर चले हैं और सबको मिलकर चलने की बात करते हैं, सबकी अस्मिताओं का संरक्षण करते हुए अपना-अपना देश अपने-अपने ढंग से चलता रहे, ऐसी बात करना दुर्बलता का प्रतीक माना गया है! इस प्रकार की एक गलत सोच विकसित हुई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत मित्रता चाहता है, सबसे मित्रता का इच्छुक है। समानता के आधार पर, हम अपनी छोटी भूमिका लेकर नहीं, और कुछ बातों में हम श्रेष्ठ भी हैं, इस भाव को लेकर भारत को खड़ा होना पड़ेगा। ऐसे रणनीतिकार भारत के चाहिए। इस भाव को प्रबल करने वाले लोग सत्ता में बैठने चाहिए। किसी भी प्रकार की देशहित के साथ समझौता करने वाली राजनीतिक शक्तियों को समाज में जागृत होकर पराभूत करने की आवश्यकता है। उनके सारे षड्यंत्रों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में कई प्रश्नों के बारे में उदासीनता का वातावरण है। ऐसे प्रश्नों के निवारण के लिए समाज को कुछ करना चाहिए, इसके प्रति उदासीनता है। उदासीनता तो है ही, अज्ञानता भी है, हम कई बातों को जानते ही नहीं। इसके बारे में समाज को जागृत करना चाहिए, इसकी आवश्यकता है। यह जो कश्मीर का प्रश्न है, हिंदुस्तान, पाकिस्तान का प्रश्न है, ऐसा जो माना जाता है। ठीक है पाकिस्तान सारी समस्याओं की जड़ में है, लेकिन क्या यह प्रश्न हमारा नहीं है, देश का नहीं है, देश के रणनीतिकारों का नहीं है। देश के अंदर राष्ट्रभाव को जागृत करते हुए, उदासीनता को दूर करते हुए प्रश्नों को दूर करने के लिए, प्रश्नों का हल ढंढने के लिए समाज के अंदर शक्ति का जागरण करना पड़ेगा। यह काम एक चुनौती है, एक आह्वान है। इसको लेकर हम जायेंगे, हम खड़े हैं। कभी-कभी लोग कहते हैं कि हो गया, अब बहुत हो गया, कितने बार कश्मीर को लेकर आंदोलन करेंगे। इस प्रश्न का भी सरल शब्दों में यही उत्तर है कि जब तक कश्मीर समस्या हल नहीं होगी, यह प्रश्न बार-बार उठता रहेगा। इसके लिए हम निरंतर प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग बड़ी सहजता से कह देते हैं कि जो नियंत्रण रेखा है, एलओसी है, उसको अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लो। क्यों झगड़ा करना। पड़ोसी देश है। बड़ा गरीब है। बड़े पिछड़ा हुआ है। भारत से ज्यादा पाकिस्तान में दर्दनाक घटनाएं होती हैं। क्या ऐसी सामान्य बुद्धि को लेकर विदेशी शक्ति की उदण्डता को देखते रहेंगे? देश के प्रश्नों के बारे में कठोरता से कहना पड़ता है, कदम उठाने पड़ते हैं। ऐसी सरकार चाहिए। अपने अस्मिता और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं। इस प्रकार की शक्ति का भाव का जागरण निरंतर करेंगे। प्रश्नों को लंबित करते जाओ, प्रश्नों की उपेक्षा करते रहो, ऐसे आत्मविश्वास से शून्य, इस प्रकार का परिचायक जो व्यवहार होता है, इससे सब लोगों को मुक्त करना, यह संकल्प हम लोगों ने लिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कश्मीर के प्रश्न को लेकर जाएंगे। लोकतंत्र में शासन जनशक्ति को ही समझता है। ऐसे प्रश्नों पर शासन जनशक्ति को ही समझता है। हमारा भी दायित्व बनता है कि हम जनशक्ति का प्रकटीकरण करें, जनशक्ति को खड़ा करें। और आवश्यकता पड़ती है तो शक्ति का लोकतांत्रिक प्रदर्शन करने की भी तैयारी करें।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(उपरोक्त आलेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश जोशी उपाख्य भैयाजी द्वारा ‘जम्मू-कश्मीर : तथ्य समस्याएं एवं समाधान’ नामक कार्यशाला में व्यक्त विचारों का मूलरूप है। इसका आयोजन 19 व 20 नवम्बर 2011 को ‘जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र’ के तत्वावधान में नागपुर स्थित रेशिमबाग में किया गया था।)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3982818729318415678?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3982818729318415678/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3982818729318415678&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3982818729318415678'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3982818729318415678'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/12/blog-post_14.html' title='समस्या के समाधान तक उठाएंगे कश्मीर मुद्दा'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-1vIOSaWQUVw/Tuhz10_7nII/AAAAAAAAAtY/bKJG0H4rNvY/s72-c/Bhiayaji%2BJoshi.png' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3292722242709317664</id><published>2011-12-12T16:40:00.004+05:30</published><updated>2011-12-12T16:48:59.083+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्र'/><title type='text'>साम्प्रदायिक हिंसा बिल के खिलाफ होगा देशव्यापी आंदोलन</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली&lt;/span&gt;।&lt;/span&gt; &lt;p align="justify"&gt;भारतीय संस्कृति सभा के तत्वावधान में दिल्ली स्थित ज्वालामुखी मंदिर में आयोजित दो दिवसीय ‘अखिल भारतीय शीर्ष संत समागम’ ने एक स्वर से “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक - 2011” का विरोध करते हुए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) को तत्काल भंग किये जाने की मांग की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समागम में पारित प्रस्ताव में विधेयक को देश को तोड़ने वाला, असंवैधानिक, हिंदू एवं मुस्लिमों को बांटने वाला, देश के हिंदुओं को गुनहगार मानकर विश्व में सहिष्णु हिंदु संस्कृति को बदनाम करने वाला, दंगाई, जेहादी, व्यवहार को प्रोत्साहन एवं हिंसा करने के बाद संरक्षण देने वाला, देश के प्रशासन के ऊपर इस कानून के द्वारा नई असंवैधानिक व्यवस्था खड़ी करने वाला बताया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-QILUuuUjEAE/TuXjCZ9nQPI/AAAAAAAAAtM/4XyikhOaQVc/s1600/RSS%2BChief.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-QILUuuUjEAE/TuXjCZ9nQPI/AAAAAAAAAtM/4XyikhOaQVc/s320/RSS%2BChief.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5685199735093674226" /&gt;&lt;/a&gt;इस दौरान विशेष रूप से आमंत्रित किये गये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत&lt;/span&gt; ने कहा कि विश्व में धर्म की एकमात्र शक्ति भारत बची है, जो अन्य मजहबों के लोगों को अपने मार्ग का रोड़ा लगता है, उनकी मंशा पूरी हो सके इसके लिए वे भारत को तोड़ने में लगे हुए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक देखने से स्पष्ट हो जाता है कि यह अन्याय को न्याय बनाने वाला, प्रशासन को पंगु और पंचमहापातक को नियम बनाने वाला विधेयक है। संघ प्रमुख ने कहा कि संत समाज के विरोध के कारण वे विधेयक में कुछ परिवर्तन की बात करने लगे हैं किंतु यह ऐसा ही है मानो ताड़का को पूतना के रूप में प्रस्तुत किया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. भागवत ने उपस्थित संत समुदाय से अपील की कि इस विधेयक को खारिज करवाने के लिए बड़ा शक्ति प्रदर्शन करना होगा जिसके लिए पूरी तैयारी रखनी है। इसके लिए आवश्यक जनजागरण की विस्तृत योजना संत समाज तय करे जिसमें संघ पूरी तरह सहभागी होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम के उपरांत संवाददाताओं से बातचीत करते हुए विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल ने कहा कि परिषद इस विधेयक सहित देश में तुष्टीकरण के प्रत्येक प्रयास का कड़ा विरोध करेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से मिलने गये 25 कांग्रेसी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना में मुस्लिम समुदाय के लिए 15 प्रतिशत बजट आवंटन का विशेष प्रावधान किये जाने को तुष्टीकरण की पराकाष्ठा करार दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्ताव में कहा गया है, “इस विधेयक से देश के मंदिर, संत, रामलीला, गणेशोत्सव तथा हिंदुओं के अन्य धार्मिक कार्यक्रम, हिंदुओं की सामाजिक धार्मिक संस्थाएं, हिंदुओं के व्यापार, जेहादियों के दया पर निर्भर हो जायेंगे। संतों की यह सभा देश के सभी संत, सभी सामाजिक-धार्मिक बिरादरी की संस्थाओं का आह्वान करती है कि इस विधेयक के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण एवं आदोलन हो और दिल्ली में भी प्रदर्शन की तैयारी हो।”&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-CnphgWMwaPg/TuXiGf3UY5I/AAAAAAAAAtA/kbyoY5U_FvI/s1600/Sant%2BSamagam%2B12.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 127px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-CnphgWMwaPg/TuXiGf3UY5I/AAAAAAAAAtA/kbyoY5U_FvI/s320/Sant%2BSamagam%2B12.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5685198705885733778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समागम में संतों ने संकल्प व्यक्त किया और कहा कि इस विधेयक को किसी भी कीमत पर कानून का रूप नहीं लेने देंगे। इसके लिए देश की जनता किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार है। संतों के इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद सहित देश के लगभग सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक संगठनों ने अपना खुला समर्थन व्यक्त किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3292722242709317664?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3292722242709317664/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3292722242709317664&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3292722242709317664'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3292722242709317664'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='साम्प्रदायिक हिंसा बिल के खिलाफ होगा देशव्यापी आंदोलन'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-QILUuuUjEAE/TuXjCZ9nQPI/AAAAAAAAAtM/4XyikhOaQVc/s72-c/RSS%2BChief.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-5193865644042263151</id><published>2011-11-18T16:59:00.004+05:30</published><updated>2011-11-22T15:56:28.300+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>पुस्तक समीक्षा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राष्ट्र निर्माण में संन्यासियों की महती भूमिका है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;इस धरा पर भारत ही एक ऐसा देश है जिसका नेतृत्व राजसत्ता ने कभी नहीं किया। हमारा समाज सदैव धर्म के आधार पर ही टिका रहा। राजाओं के युद्ध चलते रहते थे। कोई क्षेत्र कभी इधर, कभी उधर आता-जाता रहा होगा; परंतु समाज इन सब बातों से अलिप्त रहता था। गांव की व्यवस्था, कुलधर्म, व्यक्तित्व सब यथावत चलते रहते थे। देश में अनेक आततायी राज्यकर्ता आये और चले गये। समाज ने कष्ट भोगा; पर समाप्त नहीं हुआ। परम्पराओं में, संस्कारों में कुछ विरलता आई होगी; परन्तु पूर्णत: लुप्त नहीं हुई। साधु-संतों ने अत्याचारी शासक को समाप्त कर, उसी कुल के एक सात्विक वृत्ति के व्यक्ति को राज्य का भार सौंपा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आचार्य चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, गुरुनानक, देव जी महाराज, सूरदास, तुलसीदास, संत रविदास... ये तो कुछ चिर-परिचित नाम हैं जिन्होंने अपने-अपने काल में समाज के मनोबल को बनाये रखा। ये सभी भारत की महान विभूतियां हैं। इसके अलावा और भी विभूतियां हैं लेकिन उनका नाम ज्यादा प्रकाश में नहीं आ पाता। इन प्रचलित विभूतियों के साथ ही ‘लुप्त विभूतियों’ को भी प्रकाश में लाने का कार्य वरिष्ठ पत्रकार व सुपरिचित लेखक श्री विजय कुमार ने अपनी नई पुस्तक ‘सेवा पथ पर संन्यासी’ में बखूबी किया है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-dK-yiuMRIEs/TsZCEodd2iI/AAAAAAAAAsk/3UU50YNHqd4/s1600/Seva%2BPath%2Bpar%2BSanyasi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 204px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-dK-yiuMRIEs/TsZCEodd2iI/AAAAAAAAAsk/3UU50YNHqd4/s320/Seva%2BPath%2Bpar%2BSanyasi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5676297027695008290" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक में कुल 152 पृष्ठ हैं। इसमें स्वामी रामसुखदास, स्वामी विवेकानंद, महेश योगी, स्वामी रामभद्राचार्य, दादा लेखराज, रघुवीर समर्थ, स्वामी प्रणवानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा रामचंद्र वीर, तुड़को जी महाराज, तुलसीराम प्रभु, भगत पूर्ण सिंह और स्वामी निगमानंद, दंडी स्वामी विरजानंद, हरिवंश महाप्रभु, बाबा बुड्ढा, स्वामी हरिदास, रमण महर्षि, पंडित श्रद्धाराम फिल्लौर, महानामव्रत जी और स्वामी विद्यागिरि सहित कुल 71 साधु-संतों की जीवनी व राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान का संकलन है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक का नाम : &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सेवा पथ पर संन्यासी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लेखक :&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; विजय कुमार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रकाशक :&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; साहित्य एवं दृक् श्राव्य सेवा न्यास, नई दिल्ली।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पृष्ठ : &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;152&lt;/span&gt;, मूल्य : &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;75/-&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-5193865644042263151?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/5193865644042263151/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=5193865644042263151&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5193865644042263151'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5193865644042263151'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='पुस्तक समीक्षा'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-dK-yiuMRIEs/TsZCEodd2iI/AAAAAAAAAsk/3UU50YNHqd4/s72-c/Seva%2BPath%2Bpar%2BSanyasi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-95750094568361356</id><published>2011-10-14T19:51:00.008+05:30</published><updated>2011-10-16T16:09:25.778+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>'ज्यादा स्वायत्तता' का अर्थ है, कल की स्वतंत्रता</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कश्मीर मसले &lt;/span&gt;पर वार्ताकार पैनल ने अपनी रिपोर्ट भले ही केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी है, लेकिन इसकी सिफारिशों पर अमल सर्वदलीय बैठक के बाद ही होगा। क्योंकि सरकार किसी भी विवाद का जिम्मा अकेले अपने ऊपर क्यों लेना चाहेगी? हालांकि, पिछले वर्ष 20 सितम्बर को हालात का जायजा लेने दो दिवसीय दौरे पर जम्मू-कश्मीर गये 39 सदस्यीय सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल की सिफारिश पर ही वार्ताकार पैनल के गठन का फैसला किया गया था। इस कारण भी इसकी संभावना बनती है कि केंद्र सरकार इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाएगी। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम कर रहे थे, जिसमें संसद के दोनों सदनों- लोकसभा व राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष क्रमश: सुषमा स्वराज व अरुण जेटली, लोजपा प्रमुख रामबिलास पासवान सहित अन्य पार्टियों के नेता शामिल थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केंद्र ने 12 अक्टूबर 2010 को वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर के नेतृत्व में तीन सदस्यीय वार्ताकार पैनल का गठन किया था। इसके दो अन्य सदस्य शिक्षाविद् प्रो. राधा कुमार और पूर्व सूचना आयुक्त एम.एम. अंसारी थे। गृह मंत्रालय ने वार्ताकारों को कश्मीर समस्या का विस्तृत अध्ययन कर इसके समाधान का रास्ता सुझाने के लिए कहा था। पैनल ने अपने एक वर्षीय कार्यकाल के अंतिम दिन यानी 12 अक्टूबर 2011 को अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट सौंपने के बाद &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वार्ताकारों में से एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राज्य को और अधिक स्वायत्तता देने की सिफारिश की गयी है, पर यह 1953 के पहले जैसी नहीं होगी।&lt;/span&gt; हालांकि, तीनों वार्ताकारों- पडगांवकर, अंसारी और राधा कुमार ने रिपोर्ट के तथ्यों के बारे में अधिकृत रूप से कुछ भी बताने से इन्कार किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संदर्भ में जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिओम का कहना है कि अगर रिपोर्ट स्वायत्तता की पैरवी करती है तो इसके नतीजे भयानक होंगे। जम्मू, लद्दाख के लिए अलग रीजनल काउंसिल बने तो यह ठीक रहेगा, लेकिन इसका स्वरूप क्या होगा, कहा नहीं जा सकता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हालांकि, कश्मीर समस्या के समाधान के निमित्त विगत दस वर्षों में केंद्र का यह कोई प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने श्रीनगर में 24 व 25 मई 2006 को आयोजित राउंड टेबिल कान्फ्रेंस में कश्मीर समस्या पर गहन विचार विमर्श के लिए पांच कार्यदल गठित किये थे। ‘बेहतर प्रशासन’ पर गठित कार्यदल के प्रमुख एन.सी. सक्सेना, ‘आर्थिक विकास’ पर सी. रंगाराजन, ‘नियंत्रण रेखा के आर-पार सम्बंध विकसित करने’ एम.के. रसगोत्रा तथा ‘विश्वसनीयता बढ़ाने के प्रश्न’ पर मोहम्मद हामिद अंसारी (अब उप-राष्ट्रपति) के नेतृत्व वाले कार्यदलों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट 24 अप्रैल 2007 को केंद्र को सौंपी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पांचवे कार्यदल के प्रमुख थे- जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सगीर अहमद। न्यायमूर्ति अहमद ने अपनी रिपोर्ट में स्वायत्तता को अलगाववादी मांग नहीं माना और लिखा कि स्वायत्तता को बहाल करने के सम्बंध में प्रधानमंत्री स्वयं अपना तरीका व उपाय तय करें। उन्होंने अनुच्छेद 370 के अस्थाई दर्जे पर अंतिम फैसले की भी पैरवी की थी और कहा कि केन्द्र राज्य के बेहतर सम्बन्धों के लिये अनुच्छेद 370 पर अंतिम फैसला जरूरी है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10 जनवरी 2010 को जम्मू में हुई बैठक में राज्य विधानसभा के सदस्यों- हर्षदेव, डॉ. अजय, अश्विनी कुमार, शेख अब्दुल रहमान और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने रिपोर्ट को फर्जी और नेशनल कांफ्रेंस का एजेण्डा करार दिया था। इस पर जेटली ने सवाल उठाते हुए कहा था कि सितम्बर 2006 के बाद कार्यदल की कोई बैठक नहीं हुई तो यह रिपोर्ट कहां से आ गयी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दरअसल, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जेटली का तर्क उचित ही था क्योंकि न्यायमूर्ति सगीर लम्बे समय से बीमार थे और कार्यदल की बैठकों में शामिल नहीं हो पाये थे। इस रिपोर्ट में नेशनल कांफ्रेंस की मांगों की शब्दावली है। उस समय यह चर्चा जोरों पर थी कि क्या इस रिपोर्ट को नेशनल कान्फ्रेंस के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए ही कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने तैयार करवाया है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर मामले के अध्ययन के लिए पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री राम जेठमालानी की समिति भी कार्य कर चुकी है। राज्य के वर्तमान राज्यपाल एन.एन. वोहरा भी कश्मीर पर केंद्र के वार्ताकार रह चुके हैं। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सभी रिपोर्टों में कश्मीर समस्या की जटिलता की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वैसे मौजूदा वार्ताकारों की रिपोर्ट में क्या है, इसकी जानकारी इसके सार्वजनिक होने के बाद ही पता चलेगी, लेकिन चर्चा इस बात की भी है कि वार्ताकारों की रिपोर्ट विगत वर्षों में आयी न्यायमूर्ति सगीर सहित विभिन्न समितियों की रिपोर्टों से भिन्न नहीं होगी। यानी आज की ‘ज्यादा स्वायत्तता’ का मतलब है, कल की स्वतंत्रता। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-95750094568361356?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/95750094568361356/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=95750094568361356&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/95750094568361356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/95750094568361356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/10/blog-post_14.html' title='&apos;ज्यादा स्वायत्तता&apos; का अर्थ है, कल की स्वतंत्रता'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-7630564147121256818</id><published>2011-10-12T18:26:00.006+05:30</published><updated>2011-10-14T15:12:27.009+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>कश्मीर पर निरर्थक बातें</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जम्मू-कश्मीर&lt;/span&gt; भारत का अभिन्न अंग और देश का सीमावर्ती राज्य है। इस राज्य पर पड़ोसी देशों- पाकिस्तान और चीन ने 15 अगस्त 1947 के बाद पांच हमले किये हैं। इसमें चीन का एक हमला शामिल है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूह जम्मू-कश्मीर में अब भी घुसपैठ की फिराक में सदैव रहते हैं। पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर की सीमा पर तैनात भारतीय सैन्य बलों द्वारा आतंकियों से निपटना अब उनकी नियमित दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरक्षा की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के किसी भी सीमावर्ती राज्य को सेना से मुक्त करना घातक है, साथ ही अव्यवहारिक भी। चाहे कश्मीर में पूरी तरह सामान्य स्थिति ही बहाल क्यों न हो जाये, अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में सैन्य बल को सदैव तैनात रहना ही चाहिए। सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद सेना अपनी बैरकों में वापस जा सकती है, लेकिन इस अवस्था को &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विसैन्यीकरण&lt;/span&gt; नहीं कहा जा सकता। जो लोग जम्मू-कश्मीर के विसैन्यीकरण की मांग कर रहे हैं, वे देश का अहित कर रहे हैं। ऐसे लोग देश विरोधी और पाकिस्तान समर्थक हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पाकिस्तान क्यों नहीं चाहेगा कि उसके अधिकार क्षेत्र में भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर भी आ जाए। इसमें उसकी हानि क्या है? मुफ्त का चंदन घिस मेरे नन्दन। पंडित जवाहर लाल नेहरू की गलती के कारण जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में पहले से ही है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र का लगभग 10 हजार वर्ग किमी. और कश्मीर क्षेत्र का लगभग 06 हजार वर्ग किमी. पाकिस्तान के कब्जे में है। चीन ने 1962 में आक्रमण करके लद्दाख के लगभग 36,500 वर्ग किमी. पर अवैध कब्जा कर लिया। बाद में पाकिस्तान ने भी चीन को 5500 वर्ग किमी. जमीन भेंटस्वरूप दे दी, ताकि बीजिंग उसका सदैव रक्षक बना रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विगत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थायी मिशन के काउंसलर ताहिर हुसैन अंदराबी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बहस के दौरान कहा, "जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है और न ही यह कभी रहा है।" इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के उप स्थायी प्रतिनिधि रजा बशीर तरार ने कहा, “दक्षिण एशिया में जम्मू-कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को सुरक्षा परिषद के कई प्रस्तावों में मंजूर किया गया है।”  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सर्वविदित है कि जम्मू-कश्मीर, पाकिस्तान के पैदा होने पूर्व से ही भारत का अभिन्न अंग है। यह महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को किये गये विलय-पत्र पर हस्ताक्षर से ही भारत का अंग नहीं बना, इस्लामी आक्रांताओं के हमलों के पूर्व भी यह भारत का ही अभिन्न अंग था। यहीं उत्तरवैदिक काल में देश के कोने कोने से आए 6 दार्शनिकों ने पिप्पलाद ऋषि से सृष्टि रहस्यों पर तर्क किये थे। इन्हीं प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों का संग्रह विश्वख्यात दर्शन ग्रन्थ ‘प्रश्नोपनिषद्’ है। कल्हड़ की राजतरंगिणी भी इसी मिट्टी की पैदाइश है। जम्मू कश्मीर भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्राचीन भूमि है। जबकि 15 अगस्त 1947 के पहले पाकिस्तान का कहीं कोई अस्तित्व नहीं था। ऐसे में पाकिस्तानी अधिकारियों- हुसैन अंदराबी और रजा बशीर का कथन भ्रामक और झूठ का पुलिंदा तो है ही, हास्यास्पद भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर के संदर्भ में जहां तक &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जनमत-संग्रह &lt;/span&gt;का प्रश्न है, तो देश और विदेश में बहुत लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर समस्या के समाधान के रूप में जनतम-संग्रह की मांग एकदम व्यर्थ है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के दो महासचिवों ने भी कहा था कि जनमत-संग्रह की मांग अब अप्रासंगिक हो गया है। पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी जनमत-संग्रह की बात को खारिज करते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक अलग ही फॉर्मूला पेश किया था। हालांकि उनका फॉर्मूला भी विवादित ही था। लेकिन पाकिस्तानी खर्चे पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी व उनके समर्थक अब भी जनमत-संग्रह और आत्म-निर्णय का राग अलाप रहे हैं, यह हास्यास्पद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल कश्मीर में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जनमत-संग्रह&lt;/span&gt; या &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आत्म-निर्णय&lt;/span&gt; का नहीं, बल्कि यह है कि क्या पाकिस्तान का निर्माण आत्मनिर्णय या जनमत-संग्रह के आधार पर हुआ था? यदि ऐसा हो तो कश्मीर में भी होना चाहिए। लेकिन यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि आज यदि पाकिस्तान में जनमत-संग्रह कराया जाये तो शांति के पक्षधर अधिकांश पाकिस्तानी भारत में मिलने के लिए अपना मत प्रकट करेंगे। यदि अखंड भारत में जनमत-संग्रह या आत्म-निर्णय के आधार पर पाकिस्तान निर्माण का फैसला हुआ होता तो आज पाकिस्तान का अस्तित्व ही नहीं होता। तो फिर कश्मीर के संदर्भ में जनमत-संग्रह या आत्म-निर्णय का प्रश्न कहां से खड़ा किया जा रहा है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-7630564147121256818?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/7630564147121256818/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=7630564147121256818&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7630564147121256818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7630564147121256818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/10/blog-post_12.html' title='कश्मीर पर निरर्थक बातें'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4270489344334131517</id><published>2011-10-10T18:57:00.004+05:30</published><updated>2011-10-11T12:27:38.274+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नक्सली ही हैं विनायक सेन'/><title type='text'>नक्सली ही हैं विनायक सेन</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद  &lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मानवाधिकार संगठन&lt;/span&gt; पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. विनायक सेन नक्सली ही हैं। उनको निकट से जानने वाले के लिए इसमें कोई किंतु-परंतु की बात ही नहीं है। भले ही इस देश की सर्वोच्च अदालत ने पिछले दिनों उनको जमानत पर रिहा कर दिया हो, लेकिन मात्र जमानत के कारण ही कोई आरोपी दूध का धुला नहीं कहा जा सकता है। हालांकि मामले में अंतिम फैसला आना शेष है। जमानत का आधार तर्क और सबूत होते हैं; लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि अभियोजन पक्ष के हाथ वे सबूत नहीं लग सके जो विनायक सेन को उचित और कठोर दण्ड दिलवाने में मदद करते। क्या छत्तीसगढ़ सरकार की डॉ. सेन से कोई जातीय दुश्मनी थी, जो उनके खिलाफ उठ खड़ी हुई? वहां की सरकार तो पिछले कई वर्षों से हिंसक नक्सली गतिविधियों के खिलाफ जूझ रही है और राज्य में शांति व्यवस्था की स्थापना के लिए कटिबद्ध है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-kU6dMyrSS7s/TpPotKckJPI/AAAAAAAAAsE/wMU6N21dPHY/s1600/Vinayak%2BSen.jpeg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 303px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-kU6dMyrSS7s/TpPotKckJPI/AAAAAAAAAsE/wMU6N21dPHY/s320/Vinayak%2BSen.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5662125019130766578" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सबसे दु:खद है कि शीर्ष अदालत से जमानत मिलने के बाद केंद्र की कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने उनको योजना आयोग की स्वास्थ्य संबंधी सलाहकार समिति का सदस्य नामित कर दिया। केंद्र का यह रवैया घातक ही साबित हो रहा है। क्योंकि रिहाई के बाद सेन पुन: नक्सली गतिविधियों में प्राण-पण से लग गये हैं। सेन की नक्सल गतिविधियों के संदर्भ में खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने अभी हाल में एक रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि रिहाई के बाद सेन नक्सली गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय हैं और सरकार के खिलाफ रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि इस रिपोर्ट के पहले आईबी ने पिछले पांच महीने में कई बार विनायक सेन की हर गतिविधि के बारे में गृह मंत्रालय को लगातार सूचित किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईबी के अनुसार, सेन ने 10 सितंबर को डेमोक्रेटिक राइट आर्गनाइजेशन की बैठक में भी हिस्सा लिया था। यह नक्सलियों के 20 संगठनों का शीर्ष संगठन है। कोलकाता में हुई इस बैठक में सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून और गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम कानूनों को हटाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने का फैसला किया गया। हैरानी की बात यह है कि आईबी की रिपोर्ट के बावजूद अभी तक विनायक सेन की योजना आयोग की सलाहकार समिति की सदस्यता को रद्द करने की कोई पहल नहीं की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि रायपुर की अदालत ने 24 दिसम्बर 2010 को सेन को देशद्रोह का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। न्यायालय ने सेन के साथ दो अन्य लोगों को भी देशद्रोह का दोषी करार दिया था, जिसमें प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) से जुड़े नारायण सान्याल और कोलकाता के तेंदू पत्ता व्यवसायी पीयूष गुहा शामिल हैं। सेन ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील की थी, जिसको न्यायालय ने ठुकरा दी थी। इसके बाद उन्होंने शीर्ष न्यायालय में अपील की, जहां उनको 15 अप्रैल 2011 को जमानत मिल गयी। सेन पर आरोप था कि उन्होंने प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) का शहरों में नेटवर्क ख़डा करने में अहम भूमिका अदा की है। इसके अलावा उन पर बिलासपुर जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्‍याल की चिट्ठियां अन्‍य माओवादियों तक पहुंचाने के भी आरोप लगे थे। वहीं गुहा पर भी सान्याल का संदेश चोरी-छिपे माओवादियों तक पहुंचाने के आरोप लगे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विनायक सेन को समिति का सदस्य नामित करने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गहरी नाराजगी जताते हुए योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को पत्र लिखा था। मुख्यमंत्री ने कहा था- “डॉ. विनायक सेन को अदालत ने राजद्रोह का दोषी पाते हुए सजा दी है। वे इसके सहित कुछ और कानूनों के तहत सजा काट रहे हैं। उनकी अपील हाईकोर्ट में लंबित है लेकिन उनकी सजा पर रोक नहीं लगाई गई है। योजना आयोग की साख बहुत महत्वपूर्ण है और इस नाते ऐसी संस्था में डॉ. विनायक सेन को रखा जाना बहुत ही सदमे का मुद्दा है। यह तमाम तौर-तरीकों के खिलाफ भी है क्योंकि उन्हें राज्य के खिलाफ युद्ध छेडऩे के आरोप में सजा मिली हुई है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक मान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति जो उम्र कैद की सजा काट रहा है, उसे राष्ट्रीय स्तर की किसी समिति में या ऐसे किसी मंच पर कभी सदस्य नहीं बनाया जाता। देश में ऐसी कोई दूसरी मिसाल भी नहीं है। यह भी कम हैरानी की बाद नहीं है कि इस समिति में रखने के लिए देशभर में योजना आयोग को विनायक सेन से ज्यादा योग्य कोई और व्यक्ति नहीं मिला। पत्र में डॉ. रमन सिंह ने यह भी कहा था कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉ. सेन के योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है, जबकि हकीकत में ऐसी किसी बात के सुबूत नहीं हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;डॉ. रमन सिंह ने प्रधानमंत्री से इस मनोनयन पर पुनर्विचार करने का भी अनुरोध किया था और घोषणा करते हुए कहा- “मैं बहुत भारी मन के साथ यह फैसला ले रहा हूँ कि जब तक विनायक सेन के मनोनयन पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, मैं योजना आयोग की बैठकों में हिस्सा नहीं लूंगा।”  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि एक तरफ प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वयं ही कई अवसरों पर नक्सलवाद को इस देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। ऐसे में एक ऐसी समिति जिसके पदेन अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री हैं, में संदिग्ध व्यक्ति को शामिल करना केंद्र द्वारा नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई के सारे दावे को खोखला ही साबित करता है। हालांकि केंद्र नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में छत्तीसगढ़ सरकार की मदद करने की बार-बार दुहाई देता है, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पत्र पर पुनर्विचार करने को कतई गंभीर नहीं था। फिलहाल चाहे जो कुछ भी हो लेकिन केंद्र की खुफिया एजेंसी आईबी की रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री के दावे को और मजबूती प्रदान की है। अत: यह कहा जा सकता है कि आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार का रवैया कांग्रेस की अधोगति का शोकगीत बनेगी। इस कारण कांग्रेस को इतिहास के काले अध्याय में जगह मिलेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4270489344334131517?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4270489344334131517/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4270489344334131517&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4270489344334131517'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4270489344334131517'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='नक्सली ही हैं विनायक सेन'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-kU6dMyrSS7s/TpPotKckJPI/AAAAAAAAAsE/wMU6N21dPHY/s72-c/Vinayak%2BSen.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4246613873413218304</id><published>2011-09-17T17:26:00.006+05:30</published><updated>2011-10-01T16:14:21.470+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>कुरसी तू बड़भागिनी</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुस्तक समीक्षा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;व्यंग्य की विधा साहित्य में कुछ विशेष प्रकार की है। जैसे क्रिकेट में सफल गेंदबाज वही है, जिसकी गेंद की गति, दिशा और उछाल का बल्लेबाज को अंतिम समय तक अनुमान न हो पाये। सफल फिल्म और उपन्यास भी वही होता है, जिसका रहस्य और निष्कर्ष, अंत में जाकर ही पता लगता है। इसी प्रकार व्यंग्यकार जो संदेश देना चाहता है, वह प्राय: अंतिम दो तीन वाक्यों में ही स्पष्ट हो पाता है और पाठक को यात्रा करते-करते अचानक अपने लक्ष्य पर पहुंचने जैसी संतुष्टि प्राप्त होती है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हँसने-हँसाने का रुझान भी अपने में अनूठा होता है। कुछ लोग चुटकुले पढ़ना और उन्हें याद कर ठीक समय पर सुनाने के शौकीन होते हैं। इससे सभा या बैठक का माहौल खुशनुमा होता ही है साथ ही उपस्थित लोगों की थकान भी क्षण भर के लिए छू-मंतर हो जाती है। समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो बातचीत में कुछ व्यंग्यात्मक बातें प्राय: बोल देते हैं। भले ही वे साफ मन से बोली जायें; पर सुनने वाले बुरा मान जाते हैं। इससे लोगों को कभी-कभार हानि भी उठानी पड़ जाती है। हालांकि, व्यंग्य में थोड़ा सा हास्य भोजन की थाली में, चटनी और अचार जैसा मजा देता है। “मारो कहीं, लगे कहीं” और “कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना” की तरह इन विशेषताओं को ‘कुरसी तू बड़भागिनी’ नामक हास्य-व्यंग्य पुस्तक में बखूबी शामिल किया गया है। इसके लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार विजय कुमार।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पुस्तक की एक दूसरी विशेषता यह है कि इसमें विदेशी भाषाओं का घालमेल नहीं है। हालांकि आजकल हिंदी में विदेशी भाषाओं के घालमेल की एक भेड़चाल सी चल पड़ी है। फिलहाल, लेखक ने इससे यथा संभव बचने का प्रयास किया है। पुस्तक में शामिल लेखों के सामयिक होने के कारण इनकी मार के दायरे में; पुलिस, प्रशासन, पत्रकार, लेखक और व्यापारी, कर्मचारी, चिकित्सक, वकील सब आये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-sZjxgqk1XJ0/Tobu5eq7XXI/AAAAAAAAAr0/f9HsP5JGRcA/s1600/Kursi%2Bto%2Bbarbhaginee.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-sZjxgqk1XJ0/Tobu5eq7XXI/AAAAAAAAAr0/f9HsP5JGRcA/s320/Kursi%2Bto%2Bbarbhaginee.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5658472653090676082" /&gt;&lt;/a&gt;पुस्तक में छोटे-छोट कुल 48 अध्याय हैं। ये सभी; मोबाइल मीटिंग, कूड़ा जनता के सौजन्य से, राजू उठ, बैट पकड़, मेरे घर के सामने, हम भी मोबाइल हुए, कविता वायरस, डार्विन का विकासवाद, सेक्यूलर चश्मा, राहुल बाथ सोप, विकास का मूल्य, कोड नंबर का जंजाल, डॉक्टर का सेक्यूलर एजेंडा, करोड़ रुपये का इतना अपमान, कहानी नई पुरानी, हनुमान जी के आँसू, बड़े भाइयो सावधान, मैं और मोबाइल चोर, नाई से न नाई लेत..., यह भी कोई चोरी है? और हे भगवान, मैं बच गया; आदि शीर्षकों के अंतर्गत लिखे गये हैं। यह बहुत ही रोचक और हास्य-व्यंग्य की उच्च स्तरीय पुस्तक है। हालांकि पुस्तक में शामिल इन व्यंग्य लेखों की मार और धार कैसी है, इसका वास्तविक निर्णय तो पाठकों को ही करना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक : कुरसी तू बड़भागिनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक : विजय कुमार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृष्ठ 136,     मूल्य रु. 175/-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4246613873413218304?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4246613873413218304/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4246613873413218304&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4246613873413218304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4246613873413218304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='कुरसी तू बड़भागिनी'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-sZjxgqk1XJ0/Tobu5eq7XXI/AAAAAAAAAr0/f9HsP5JGRcA/s72-c/Kursi%2Bto%2Bbarbhaginee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1758853915767128391</id><published>2011-08-30T19:17:00.004+05:30</published><updated>2011-08-30T19:59:05.209+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>अलगाववाद को बढ़ाने वाला कदम</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला&lt;/span&gt; ने 28 अगस्त को पत्थरबाजों को ईद का तोहफा देते हुए उनकी माफी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद से सटे नौहट्टा पुलिस थाने पर कश्मीर की आजादी के पक्ष में नारेबाजी करते हुए 300 से ज्यादा मोटरसाइकिल सवार पत्थरबाज युवकों ने 27 अगस्त को जिस तरह पेट्रोल बम से हमला कर छह पुलिसकर्मियों को घायल किया; वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कश्मीर की आजादी के पक्ष में लगाये गये नारों से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सब अलगाववादियों के इशारे पर किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार को पत्थरबाजों को ईद पर रिहा करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-eEU9d5wbBL0/Tlzq15hlNjI/AAAAAAAAArc/m5y7R0IlxdA/s1600/OMAR_ABDULLAH.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 177px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-eEU9d5wbBL0/Tlzq15hlNjI/AAAAAAAAArc/m5y7R0IlxdA/s320/OMAR_ABDULLAH.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5646646244511397426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि 12 सौ के करीब पत्थरबाजों को रिहा कर भी दिया जाता है, तो इसकी क्या गारंटी है कि वह दोबारा अलगाववादियों के बहकावे में आकर कश्मीर की शांति में रोड़ा नहीं बनेंगे। पुलिस स्टेशन या सुरक्षाबलों पर पत्थर से हमले की घटनाएं बीते एक सप्ताह के दौरान कई बार हुई हैं। घाटी के खराब हो रहे हालात के मद्देनजर सरकार को चाहिए कि वह हिरासत में लिए गए पत्थरबाजों को न छोड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदित हो कि पिछले साल गर्मी के मौसम में इन्हीं पत्थरबाजों के कारण घाटी अशांत रही। इस दौरान करीब 1300 युवकों के खिलाफ पत्थरबाजी, आगजनी और लूटमार के मामले दर्ज किए गए थे। इसमें से कई अब भी फरार हैं। उमर सरकार के नये फरमान के अनुसार, इन युवकों को माफी देते हुए इनके खिलाफ सभी आपराधिक मामले वापस ले लिए जाएंगे। बकौल उमर अब्दुल्ला, यह माफी उन पत्थरबाजों के लिए नहीं है, जो आगजनी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने व लूटमार करने में शामिल रहे हैं। ऐसे में करीब 100 युवक माफी से वंचित रहेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सदंर्भ में सरकार को कश्मीरी जनता के हित में भी सोचना चाहिए, क्योंकि वह लगातार घाटी बंद और पत्थरबाजों की गतिविधियों से तंग आ चुकी है। वे इस बात से भली भांति परिचित हैं कि उनकी रोजी-रोटी पर्यटन उद्योग पर टिकी हुई है। घाटी में अगर हालात बिगड़ते हैं तो पर्यटकों की संख्या पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। श्री अमरनाथ यात्रा के शांतिपूर्ण ढंग से बीत जाने पर लोगों को लग रहा था कि हालात सामान्य हैं, लेकिन अलगाववादी नेता स्थानीय युवाओं को भड़का कर अपने मंसूबों को हवा देने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में अब्दुल्ला सरकार को पत्थरबाजों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए, नहीं तो सरकार का ऐसा रवैया उनको अलगाववादी गतिविधियों के लिए और प्रोत्साहित ही करेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1758853915767128391?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1758853915767128391/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1758853915767128391&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1758853915767128391'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1758853915767128391'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/08/blog-post_30.html' title='अलगाववाद को बढ़ाने वाला कदम'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-eEU9d5wbBL0/Tlzq15hlNjI/AAAAAAAAArc/m5y7R0IlxdA/s72-c/OMAR_ABDULLAH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4615068430498254919</id><published>2011-08-28T12:31:00.004+05:30</published><updated>2011-09-06T18:38:59.944+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी वार्ताकारों की रिपोर्ट !</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;कश्मीर मसले पर केंद्र सरकार के त्रि-सदस्यीय वार्ताकार पैनल की रिपोर्ट सितम्बर में आने की संभावना है। इस रिपोर्ट के राजनीतिक या कूटनीतिक निहितार्थ क्या होंगे, यह तो समय ही बताएगा; लेकिन पैनल में शामिल दिलीप पडगांवकर और प्रो. राधा कुमार की गतिविधियों के प्रकाश में आने तथा हाल के बयानों ने इस रिपोर्ट को आने से पूर्व ही विवादित बना दिया है। वार्ताकार पैनल के तीसरे सदस्य पूर्व सूचना आयुक्त एम.एम. अंसारी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वार्ताकार पैनल के प्रमुख दिलीप पडगांवकर ने अफजल गुरू पर चौंकाने वाला बयान दिया था। अफजल संसद पर 13 दिसम्बर 2011 को हुए हमले का मास्टरमाइंड है। इस हमले में 5 आतंकियों और 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। अफजल की दया याचिका को नामंजूर करने की सिफारिश करने वाली फाइल को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। इस बात की पुष्टि करते हुए गृह राज्यमंत्री एम. रामचंद्रन ने विगत दिनों राज्यसभा में बताया कि अफजल की दया याचिका से संबंधित फाइल को 27 जुलाई 2011 को राष्ट्रपति के सचिवालय को भेजा जा चुका है। इसके तत्काल बाद पडगांवकर ने कहा कि अफजल की फांसी के संदर्भ में केंद्र सरकार ने गलत समय पर निर्णय लिया है। इसका सीधा असर कश्मीर के शांतिपूर्ण माहौल पर पड़ेगा। जबकि वार्ताकार पैनल की अन्य सदस्य प्रो. कुमार ने कहा कि वे अपनी निजी राय में अफजल की फांसी की सजा से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है अफजल को फांसी देने से कश्मीर पर पड़ने वाले असर को इतनी जल्दी समझना मुमकिन नहीं है। इसके लिए इंतजार करना होगा।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-LABwGv5JUuk/Tlnoes5YJ2I/AAAAAAAAArU/_aYsHW3p1rU/s1600/Kashmir%2BInterlocutors.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 227px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-LABwGv5JUuk/Tlnoes5YJ2I/AAAAAAAAArU/_aYsHW3p1rU/s320/Kashmir%2BInterlocutors.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5645799222031165282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं, पैनल के तीसरे सदस्य अंसारी ने पडगांवकर और प्रो. कुमार के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि अफजल की फांसी का कश्मीर मामले से कोई संबंध नहीं है। ये सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़ा मसला है। अंसारी के मुताबिक, इस तरह की घटनाएं देश के दूसरे हिस्सों में भी घट रही हैं। इन आतंकी घटनाओं को कश्मीर मसले से जोड़ा जाना कतई सही नहीं होगा। विदित हो कि अफजल जम्मू-कश्मीर के सोपोर का रहने वाला है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हालांकि इससे पहले कश्मीरी अलगाववादी गुलाम नबी फई प्रकरण के प्रकाश में आने के बाद उसके निमंत्रण पर जाने वाले वार्ताकारों की काफी किरकिरी हो चुकी है। इस कारण त्रि-सदस्यीय पैनल की देश के प्रति निष्ठा भी संदिग्ध मानी जाने लगी है। फई वॉशिंगटन स्थित कश्मीरी अमेरिकन कौंसिल (केएसी) का प्रमुख है। वह 1990 से अमेरिका में रह रहा है। उसको कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में एफबीआई ने 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। फिलहाल अमेरिकी अदालत ने फई को गहन निगरानी में रखने का आदेश सुनाते हुए 27 जुलाई को जमानत दे दी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पडगांवकर और प्रो. कुमार पर आरोप लगा था कि उन्होंने फई द्वारा विदेशों में कश्मीर मसले पर आयोजित कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया और पाकिस्तान के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किये। हालांकि पडगांवकर और प्रो. कुमार के अलावा इस श्रेणी में कई और भारतीय बुद्धिजीवी भी हैं, जिन्होंने समय-समय पर भारत की कश्मीर नीति के खिलाफ बोला। कश्मीर मसले पर फई के सम्मेलनों में भागीदारी पर अंसारी ने पडगांवकर की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था- “अगर पडगांवकर की जगह मैं होता तो वार्ताकार पैनल से इस्तीफा दे देता।” अंसारी ने प्रो. कुमार पर भी काफी तीखी टिप्पणी की थी। अंसारी की टिप्पणी से नाराज कुमार ने गृह मंत्रालय को अपना इस्तीफा सौंपते हुए दो टूक कह दिया था कि अंसारी के साथ काम करना उनके लिए आसान नहीं होगा। हालांकि उन्होंने मंत्रालय के काफी मान-मनौव्वल के बाद अपना इस्तीफा वापस ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान देने वाली बात है कि अफजल मसले पर नेशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी और अलगाववादी संगठन हुर्रियत कान्फ्रेंस ने भी पडगांवकर व प्रो. कुमार के सुर में सुर मिलाया है। पडगांवकर और कुमार का अफजल के संदर्भ में दिया गया यह बयान देश-विरोधी तो है ही; साथ ही आतंकियों के मनोबल को बढ़ाने वाला भी है। उनका बयान प्रत्येक भारतीय को यह सोचने के लिये मजबूर करता है कि क्या वे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट तो नहीं हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि क्या देश का जनमानस कश्मीरी अलगाववादी फई की मेहमाननवाजी का लुफ्त उठाने, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में कश्मीर मसले पर कथित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में बोलने, अलगाववादी संगठनों के सुर में सुर मिलाने और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी अफजल पर बयान देने वाले पडगांवकर और राधा कुमार पर क्या विश्वास किया जा सकता है? कश्मीर समस्या का संभावित हल तलाशने के निमित्त सितम्बर में आने वाली उनकी रिपोर्ट पर क्या सहज ही विश्वास किया जा सकेगा? पडगांवकर व कुमार की गतिविधियों और बयानों से अभी से स्पष्ट होने लगा है कि उनकी कश्मीर मसले पर संभावित रिपोर्ट ‘अलगाववाद का पुलिंदा’ ही होगी!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4615068430498254919?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4615068430498254919/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4615068430498254919&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4615068430498254919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4615068430498254919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html' title='‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी वार्ताकारों की रिपोर्ट !'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-LABwGv5JUuk/Tlnoes5YJ2I/AAAAAAAAArU/_aYsHW3p1rU/s72-c/Kashmir%2BInterlocutors.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1814734614443665762</id><published>2011-08-23T16:49:00.005+05:30</published><updated>2011-08-23T17:13:05.507+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>आईएसआई के एजेंट भी हो सकते हैं कश्मीर लौटने वाले युवा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वर्ष 1989 के बाद &lt;/span&gt;हथियारों का प्रशिक्षण लेने के लिए जम्मू-कश्मीर के कुछ युवा पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) या पाकिस्तान चले गये थे। इस समय उनके वापस लौटने की चर्चाएं जोरों पर हैं। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों का कहना है कि इन युवाओं की वापसी और उनको मुख्य धारा में लाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या वापस लौटने वाले युवा भारत के ही हैं, या उनके भेस में कोई दूसरा आंतकी या आईएसआई का एजेंट तो नहीं घुस रहा है। यह सुनिश्चित करना अति आवश्यक है। क्योंकि जो युवा पीओके या पाकिस्तान गये थे, उनका भारत सरकार के पास कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जम्मू-कश्मीर सरकार को आवास एवं पुनर्वास नीति के तहत कई आवेदन मिले हैं और सरकार ने इन युवाओं की वापसी के लिए 28 नामों की सूची भी बनायी है। इनके परिवार वालों ने राज्य सरकार से आग्रह किया था कि उनके संबंधी वापस कश्मीर लौटना चाहते हैं। इन परिवारों को परामर्श दिया गया है कि उनके संबंधी इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास से सम्पर्क कर सकते हैं। यहां उन्हें एक अस्थायी दस्तावेज दिया जायेगा। इसके माध्यम से वे बाघा या किसी और बिंदु से सीमा पार कर सकते हैं। उनको नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार अर्थात् भारत की तरफ लौटने के लिए यात्रा दस्तावेजों का लाभ दिया जा सकता है। इससे संबंधित कुछ प्रमुख बिंदुओं पर पवन कुमार अरविंद ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े विद्वानों, वुद्धिजीवियों और पत्रकारों से दूरभाष पर बातचीत की है। प्रस्तुत है अंश-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार श्री &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जवाहर लाल कौल&lt;/span&gt; का कहना है- “कश्मीर से जो लोग 1990 के दशक के बाद गये हैं, सबसे मुख्य बात है कि वे एक साथ नहीं गये। अलग-अलग गये हैं। ये पता करना बहुत ही कठिन है कि जो गये, वही लोग वापस आ रहे हैं। क्योंकि जो गये उनके संदर्भ में राज्य और केंद्र सरकारों के पास कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। यदि सही लोग वापस भी आ रहे हैं तो कैसे पता चलेगा कि उनका मन परिवर्तित हो गया है और वे अब आतंकवाद की तरफ कभी नहीं लौटेंगे। वे सामान्य जीवन जीना चाहते हैं। पिछले वर्षों में यह देखा गया है कि पाकिस्तान से वापस लौटने वाले कुछ युवक फिर से आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाये गये। प्रबल संभावना इस बात की भी है कि वापस लौटने वालों की आड़ में पाकिस्तान और अलगाववादी तत्व अपने जासूस भी भेज सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार क्या कर सकेगी? इसलिए इस मसले पर सोच समझकर निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिओम&lt;/span&gt; का कहना है- “युवाओं की कश्मीर वापसी पाकिस्तान की एक चाल है। ये युवा यहां आकर कश्मीरी अलगाववादियों को मजबूती ही प्रदान करेंगे। यह देश के हित में नहीं है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम्मू में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पंजाब केसरी से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार श्री गोपाल सच्चर&lt;/span&gt; का कहना है- “यह एक बहुत लंबा और टेढ़ा विषय है। क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि कितने लोग कश्मीर से पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) या आजाद कश्मीर गये हैं। वहां क्या करते हैं? क्यों वापस आना चाहते हैं? बड़ा प्रश्न यह है कि इन युवाओं को जिन लोगों या आतंकी समूहों ने आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया, वे उन लोगों को पुन: कश्मीर लौटने देंगे। यदि लौटने देंगे तो किन शर्तों पर, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इसके साथ ही बहुत से युवा ऐसे भी हैं, जिन्होंने शादी कर ली है, उनके बच्चे भी हैं। उनके बच्चे कैसे आ सकते हैं यहां? यदि वे आते हैं तो कहां के नागरिक कहे जायेंगे? दूसरी बड़ी बात यह है कि लौटने वालों को सरकार नौकरी देने की बात कर रही है। जबकि राज्य में लाखों बेरोजगार युवा पहले से ही मौजूद हैं। बेरोजगार युवा सोचेंगे कि जो वापस आये उनको तो नौकरी मिल गयी लेकिन हम पढ़े-लिखे सीधे-साधे लोगों के प्रति सरकार गंभीर नहीं है। इससे तो इन बेरोजगार युवाओं को आतंकी रास्ता अख्तियार करने का प्रोत्साहन ही मिलेगा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जम्मू में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिंद उर्दू दैनिक के संवाददाता श्री नरेश ठाकुर&lt;/span&gt; ने कहा- “जो आतंकी शिविर चल रहे हैं, वो पाकिस्तान की धरती पर चल रहे हैं। ये शिविर भारत-पाकिस्तान सीमा के अत्यंत निकट हैं। लेकिन इस्लामाबाद इसको मानने को तैयार नहीं है। इन शिविरों के सीमा के अत्यंत निकट होने के कारण आतंकी गतिविधियों में वृद्धि होगी, क्योंकि जो लोग वापस आ रहे हैं उनका उन शिविरों से जान-पहचान होगा ही, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;म्मू-कश्मीर विचार मंच, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अध्यक्ष श्री अजय भारती &lt;/span&gt;का कहना है- “यह देश की अखण्डता के लिए खतरा तो है ही विशेषकर कश्मीर घाटी की भोली-भाली गरीब जनता के विरुद्ध किया जानेवाला निर्णय होगा। याद रखना चाहिए कि ये युवक जबरदश्ती पाकिस्तान नहीं गये बल्कि अपनी मर्जी से गये, बंदूक के आकर्षण व आतंकवाद के नशे में दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से हथियार और अलगाववाद का प्रशिक्षण लेने के लिए गये। आईएसआई जैसी बदनाम संस्था जब भारतीय दूतावास के अधिकारियों तथा पढ़े-लिखे भारतीयों का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों में कर सकती है तो समझना चाहिए कि ये नौजवान जो 20 साल से उनकी गोद में बैंठे हैं, उनका कैसे ‘ब्रेन वाश’ किया होगा। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अत: इस देश विरोधी कदम को कभी नहीं उठाना चाहिए।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हिंदुस्थान समाचार’ न्यूज एजेंसी के जम्मू ब्यूरो प्रमुख श्री &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बलवान सिं&lt;/span&gt;ह का कहना है- “इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वापस लौटने वाले युवा पुन: सामान्य जीवन जीयेंगे। क्योंकि जो लोग पहले वापस आये उनमें से अधिकांश आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाये गये। उनको यहां लाकर बसाना सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं होगा।” &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1814734614443665762?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1814734614443665762/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1814734614443665762&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1814734614443665762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1814734614443665762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/08/blog-post_23.html' title='आईएसआई के एजेंट भी हो सकते हैं कश्मीर लौटने वाले युवा'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-7800910769973551344</id><published>2011-08-18T15:41:00.005+05:30</published><updated>2011-08-18T19:50:14.024+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सौ प्याज और सौ जूते भी'/><title type='text'>सौ प्याज और सौ जूते भी ...</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कांग्रेस-नीत यूपीए&lt;/span&gt; सरकार के नीति नियंताओं को अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपार जन-समर्थन का शायद अंदाजा नहीं था, नहीं तो एक ही सरकार, एक ही मुद्दे पर, एक ही व्यक्ति के समक्ष दो बार शाष्टांग डंडवत् क्यों करती। पहली बार जंतर-मंतर प्रकरण में तो केवल घुटने टेकने से ही काम चल सकता था लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों के कारण केंद्र ने शाष्टांग डंडवत् कर मामले को जल्दबाजी में रफा-दफा करना ही उचित समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के इस रवैये ने अन्ना टीम को प्रोत्साहित ही किया, नहीं तो अन्ना की क्या मजाल जो फिर अनशन करने की सोचते। यह तो केंद्र सरकार के नीति नियंताओं की ही गलती है जिसने सरकार को लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए दस सदस्यीय संयुक्त समिति के गठन पर राजी किया और फिर समिति की कुछ बैठकों के बाद अन्ना टीम को ठेंगा भी दिखा दिया। हालांकि सरकार के ये ‘चौमुखी प्रतिभा के धनी’ नीति नियंता सत्ता के नशे में अपने को ‘बहुमुखी प्रतिभा का धनी’ समझने लगे थे, इसलिए दूसरा अनशन अवश्यंभावी ही था।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-T5Qk7a9C9Og/TkzlgD75vII/AAAAAAAAAqg/-mrr4_yKJi0/s1600/Anna_Hazare.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 198px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-T5Qk7a9C9Og/TkzlgD75vII/AAAAAAAAAqg/-mrr4_yKJi0/s200/Anna_Hazare.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642136772163517570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे ने जब 16 अगस्त के अपने दूसरे चरण के अनशन की घोषणा की तो कांग्रेस के नेता और कुछ मंत्री उनके ऊपर भिन्न-भिन्न कोणों से अमर्यादित हमला बोलने लगे। उनको भ्रष्टाचार में लिप्त भी बताया गया। अपने आरोपों के समर्थन में कांग्रेस नेताओं ने न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत आयोग की रिपोर्ट का भी हवाला दिया। पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी तो अपना आपा ही खो बैठे। उन्होंने हमला बोलते हुए कहा था, "अन्ना तुम तो खुद ही भ्रष्ट हो। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि अदालत की ओर से नियुक्त किये गये जांच आयोग ने ऐसा कहा है।” हालांकि अन्ना पर किये गये इस व्यक्तिगत हमले की चारों तरफ कड़ी आलोचना हुई थी और पार्टी को अपने सुर बदलने पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मसले पर सरकार की जो किरकिरी हुई, उसका प्रत्यक्ष कारण पार्टी और सरकार में शामिल वे लोग हैं जिनको न तो समाज का व्यावहारिक ज्ञान है और न ही जनता के नब्ज का। इसी कारण केंद्र सरकार को वही करना पड़ा जो वह नहीं चाहती थी। अर्थात्- अन्ना के समक्ष एक बार फिर शाष्टांग डंडवत्। इस संदर्भ में यदि यह कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सरकार ने अन्ना प्रकरण पर ‘सौ प्याज और सौ जूते भी’ वाली कहानी को हूबहू चरितार्थ किया है। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-7800910769973551344?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/7800910769973551344/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=7800910769973551344&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7800910769973551344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7800910769973551344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/08/blog-post_18.html' title='सौ प्याज और सौ जूते भी ...'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-T5Qk7a9C9Og/TkzlgD75vII/AAAAAAAAAqg/-mrr4_yKJi0/s72-c/Anna_Hazare.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-8001704076809915459</id><published>2011-08-11T20:04:00.005+05:30</published><updated>2011-08-28T12:38:23.579+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><title type='text'>‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी पडगांवकर की रिपोर्ट !</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;कश्मीर मसले पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त त्रि-सदस्यीय वार्ताकार दल के प्रमुख दिलीप पडगांवकर का अफजल गुरू के संदर्भ में दिया गया बयान देश-विरोधी तो है ही; साथ ही आतंकियों के मनोबल को बढ़ाने वाला भी है। उनका बयान प्रत्येक भारतीय को यह सोचने के लिये मजबूर करता है कि क्या वे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट तो नहीं हैं? पडगांवकर ने कहा है कि संसद हमले के दोषी अफजल की फांसी के संदर्भ में केंद्र सरकार ने गलत समय पर निर्णय लिया है। इसका सीधा असर कश्मीर के शांतिपूर्ण माहौल पर पड़ेगा।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-0HEKAudTESs/TkPovWM9NSI/AAAAAAAAAqY/wtm5CchieOM/s1600/Dileep-Padgaonkar%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 177px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-0HEKAudTESs/TkPovWM9NSI/AAAAAAAAAqY/wtm5CchieOM/s200/Dileep-Padgaonkar%2B1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5639607058509411618" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने संसद पर हमले के दोषी अफजल की दया याचिका को नामंजूर करने की सिफारिश करने वाली फाइल को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। इस बात की पुष्टि गृह राज्यमंत्री एम. रामचंद्रन ने राज्यसभा में की। उन्होंने बताया कि अफजल की दया याचिका से संबंधित फाइल को 27 जुलाई 2011 को राष्ट्रपति के सचिवालय को भेजा जा चुका है। विदित हो कि 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले में 5 आतंकियों और 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। अफजल इस हमले का मास्टर माइंड है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दूसरा ऐसा अवसर है जब पडगांवकर इस तरह के विवादों में घिरे हैं और उनकी देश के प्रति निष्ठा संदिग्ध हो गयी है। इससे पहले कश्मीरी अलगाववादी डॉ. गुलाम नबी फई प्रकरण पर उनकी काफी किरकिरी हुई थी। पडगांवकर पर आरोप है कि उन्होंने फई द्वारा विदेशों में कश्मीर मसले पर आयोजित कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया और पाकिस्तान के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किये। हालांकि पडगांवकर के अलाव इस श्रेणी में कई और भारतीय बुद्धिजीवी भी हैं, जिन्होंने समय-समय पर भारत की कश्मीर नीति के खिलाफ बोला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदित हो कि फई वॉशिंगटन स्थित कश्मीरी अमेरिकन कौंसिल (केएसी) का प्रमुख है। वह 1990 से अमेरिका में रह रहा है। उसको कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) ने 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। फिलहाल अमेरिकी अदालत ने फई को गहन निगरानी में रखने का आदेश सुनाते हुए 27 जुलाई को जमानत दे दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि कश्मीरी अलगाववादी फई की मेहमाननवाजी का लुफ्त उठाने, सम्मेलनों में कश्मीर मसले पर कथित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में बोलने और अब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी अफजल पर बयान देने वाले पडगांवकर पर क्या विश्वास किया जा सकता है? कश्मीर समस्या का संभावित हल तलाशने के निमित्त सितम्बर में आने वाली उनकी रिपोर्ट पर क्या सहज ही विश्वास किया जा सकेगा? पडगांवकर की गतिविधियों और बयानों से अभी से स्पष्ट होने लगा है कि उनकी कश्मीर मसले पर संभावित रिपोर्ट ‘अलगाववाद का पुलिंदा’ ही होगी !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-8001704076809915459?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/8001704076809915459/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=8001704076809915459&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8001704076809915459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8001704076809915459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='‘अलगाववाद का पुलिंदा’ होगी पडगांवकर की रिपोर्ट !'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-0HEKAudTESs/TkPovWM9NSI/AAAAAAAAAqY/wtm5CchieOM/s72-c/Dileep-Padgaonkar%2B1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1095301817338854699</id><published>2011-07-28T12:22:00.009+05:30</published><updated>2011-07-28T17:45:18.020+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फई के बयान से फिर बेनकाब हुआ पाक'/><title type='text'>फई के बयान से फिर बेनकाब हुआ पाक</title><content type='html'>&lt;h2&gt;उजागर हुआ आईएसआई का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र&lt;/h2&gt; &lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;u&gt;पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली&lt;/u&gt;।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;कश्मीरी अलगाववादी नेता डॉ. गुलाम नबी फई की गिरफ्तारी के बाद से पाकिस्तान भले ही यह कहता रहा हो कि अमेरिका ने फई की गिरफ्तारी इस्लामाबाद को बदनाम करने के उद्देश्य से की है तथा फई से उसका व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का कोई लेन-देन नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिकी अदालत के बुधवार के फैसले के बाद फई द्वारा जारी लिखित बयान ने स्वयं ही इस्लामाबाद की वास्तविक मनसा स्पष्ट कर दी है। इस बयान में फई ने कहा है कि कश्मीर के लोगों को अमेरिका से डरना नहीं चाहिए। उसने कहा, "मैं कहता हूं कि कश्मीर के लोगों को यह सोच कर डरने की जरूरत नहीं है कि विश्व शक्तियां और खास कर अमेरिका उन्हें निराश करेगा।” अदालत के फैसले के बाद फई के वकील खुर्रम वाहिद ने उसके लिखित बयान की प्रतियां वितरित की। वाहिद ने कहा कि यह बयान अदालत के फैसले के बाद तैयार किया गया है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फई ने कहा, "जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों के प्रति मेरी आजीवन प्रतिबद्धता रही है चाहे वह किसी भी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के हों। मेरी प्रतिबद्धता उन्हें अपने भविष्य का फैसला करने के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार हासिल करने में मदद करने की है। ईश्वर चाहता है कि मैं आने वाले समय में ऐसा करता रहूं।” इस पत्र में अलगाववादी नेता फई ने अमेरिका के परंपरागत समर्थन तथा दक्षिण एशिया क्षेत्र के प्रति राष्ट्रपति बराक ओबामा के विचारों की सराहना भी की है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-4dMWOrGF4Bo/TjEIWZdADnI/AAAAAAAAAqI/ODK4OMp5KQA/s1600/ghulam-nabi-fai.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 193px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-4dMWOrGF4Bo/TjEIWZdADnI/AAAAAAAAAqI/ODK4OMp5KQA/s200/ghulam-nabi-fai.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5634293789699870322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अमेरिकी अटार्नी ने बताया कि 19 जुलाई को गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान फई ने आईएसआई के साथ अपने संबंध और धन मिलने की बात स्वीकार कर ली थी। एफबीआई ने अपने शपथ-पत्र में भी इस बात का जिक्र किया है। फई के उपर्युक्त दोनों बयान यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह कश्मीरी अलगाववाद का न केवल प्रबल समर्थक है, बल्कि उसने अमेरिका में कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से धन लेकर उसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत था।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;कश्मीरी मूल के अमेरिकी नागरिक फई को संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) ने कश्मीर मसले पर लाबिंग और पाकिस्तान सरकार व उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में 19 जुलाई को वर्जीनिया में गिरफ्तार किया था। वॉशिंगटन स्थित कश्मीर सेंटर या कश्मीर अमेरिकी परिषद (केएसी) के कार्यकारी निदेशक 62 वर्षीय फई पर अमेरिका में भारत के खिलाफ अभियान चलाने और कश्मीर पर पाकिस्तान के लिए लाबिंग करने का आरोप है। संगठन का दावा रहा है कि यह ग़ैर-सरकारी है और अमेरिकियों से ही इसे धन मिलता है। लेकिन एफ़बीआई का कहना था कि 1990 के दशक से लेकर अब तक इस संगठन को पाकिस्तान सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी से गैर-कानूनी रूप से 40 लाख डॉलर मिले हैं। इस धन का इस्तेमाल उसने अमेरिका की कश्मीर नीति को प्रभावित करने के लिए किया। केएसी के माध्यम से उसने कश्मीर के लिए लॉबिंग की, सेमिनार आयोजित कराए, अखबारों में लेख लिखे और अमेरिकी नेताओं के साथ बैठकें कीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फई की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान ने एफबीआई के आरोप को ही खारिज कर दिया और कहा था कि अमेरिकी एजेंसी के आरोप निराधार व मनगढ़ंत हैं। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका पर उसके खिलाफ अपमानजनक अभियान चलाने का आरोप लगाया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमने इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास में अपनी आपत्ति दर्ज करायी है, खासकर पाकिस्तान के खिलाफ अपमानजनक अभियान पर।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यातव्य है कि अमेरिकी अदालत ने बुधवार को फई को ज़मानत देते हुए उसे घर में ही नज़रबंद रखने का आदेश दिया। अदालन ने कहा कि वह अमेरिका से बाहर नहीं जा सकता। उसको इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में रखने का भी आदेश सुनाया गया है। इसके लिये उसके पैर में रेडियो टैग बांधा जायेगा। वर्जीनिया प्रांत के एलेक्जेंड्रिया जिला अदालत के मजिस्ट्रेट जॉन एंडरसन ने बुधवार को फई को एक लाख डॉलर के निजी मुचलके पर जमानत का फैसला किया। साथ ही इस मामले में गिरफ्तार उसके दूसरे साथी ज़हीर अहमद से भी मिलने की इजाजत नहीं होगी। अदालत ने फई दम्पति से अपने-अपने पासपोर्ट भी जमा करने के लिये कहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्राइलक्रीम और 30 प्लस कोड से फई को मिलता था पैसा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एफबीआई का आरोप था कि फई ने एक विदेशी एजेंट की तरह अमेरिका में काम किया। उसने विदेशी एजेंट रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लंघन किया है। किसी अन्य देश के लिए छिपे तौर पर एजेंट के रूप में काम करना एक अपराध है। यहां तक कि वह आईएसआई से कोड वर्ड में बात करता था। 'ब्राइलक्रीम' और '30 प्लस' कुछ ऐसे गुप्त कोड थे जिसके माध्यम से आईएसआई और फई के बीच पैसे का लेनदेन होता था। एफबीआइ के मुताबिक, फई का पाकिस्तानी सूत्रधार जावेद अजीद खान ने उससे पूछा था कि क्या तुम्हें सारा सामान मिल गया? इसके जवाब में फई ने कहा था कि 75 मिलीग्राम ब्राइलक्रीम के अलावा उसे सबकुछ मिल गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एफबीआई को संदेह है कि केएसी के माध्यम से अमेरिका कश्मीर को लेकर दुष्प्रचार जारी रखने के लिए फई द्वारा मांगे गए 75 हजार डॉलर के लिए यह कूट भाषा थी। उसी बातचीत में फई ने उससे दो-तीन पीस ब्राइलक्रीम (बालों में लगाने वाला क्रीम) लंदन लेते आने को कहा था। इसके बारे में एफबीआइ को संदेह है कि उसने अपने पाकिस्तानी आकाओं से 20-30 हजार डॉलर की मांग की थी। अगले वर्ष फई ने अपने एक अन्य पाकिस्तानी आका अहमद से पैसे के लिए कूट शब्द शक्तिवर्धक कैप्सूल '30 प्लस' की मांग की। एफबीआइ के मुताबिक, फई ने अपने लिए 30 हजार डॉलर की मांग की थी। इस बातचीत के बाद केएसी के खाते में 10 जनवरी से 28 मार्च के बीच तीन चेक के जरिए 23 हजार डॉलर जमा किए गए। फई के साथ अमेरिकी नागरिक जहीर अहमद को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया गया है। दोषी पाए जाने पर दोनों को पांच साल तक कारावास की सजा हो सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, अमेरिका व अन्य देशों में कश्मीर मसले पर लॉबिंग करने वालों में केवल फई व जहीर ही नहीं हैं, इसके अलावा भी कई लोग हैं। एफबीआई के मुताबिक, अमेरिका में आईएसआई के एजेंट पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिकों की जासूसी कर रहे हैं और ये लोग इन नागरिकों को धमका भी रहे हैं। इस अभियान में मेजर जनरल मुमताज अहमद बाजवा शामिल है जो आईएसआई के सुरक्षा निदेशालय में काम करता है और विदेशों में कश्मीर पर आतंकी संगठनों का कामकाज देखता है। साथ ही न्यूयॉर्क स्थित पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास में काम करने वाला अधिकारी मोहम्मद तस्लीम को आईएसआई का एजेंट बताया गया है। तस्लीम आईएसआई के विचारों से सहमत नहीं होने वाले लोगों की जासूसी करता है और पाकिस्तानी सेना का विरोध करने वालों को धमका रहा है। वह खुद को एफबीआई का एजेंट बताता था। इस पर सीआईए के निदेशक लियोन पैनेटा और आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा के बीच काफी गरम बहस हुई थी। इसके साथ ही पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के लिए लंदन स्थित नाज़िर अहमद शॉल का जस्टिस फाउंडेशन कश्मीर सेंटर, ब्रुसेल्स व बेल्जियम में अब्दुल मजीद ट्रेंबू का कश्मीर सेंटर यूरोपियन यूनियन प्रमुख रूप से शामिल हैं।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-YbiPag678hc/TjEIjVdug5I/AAAAAAAAAqQ/Qpuz6KZDnWs/s1600/ISI%2BLogo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 193px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-YbiPag678hc/TjEIjVdug5I/AAAAAAAAAqQ/Qpuz6KZDnWs/s200/ISI%2BLogo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5634294011967472530" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फई की गिरफ्तारी में अमेरिका ने जानबूझकर की देरी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस संदर्भ में एफबीआई का कहना है कि वह इस साल की शुरुआत में ही फई को गिरफ्तार कर सकता था, लेकिन कुछ राजनैतिक मजबूरियों की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका। इसका अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय और सीआईए ने उसे ऐसा करने से रोका होगा। क्योंकि अमेरिका को उस समय अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के पाकिस्‍तान में होने की जानकारी थी। शायद इसी कारण से अमेरिका पाकिस्‍तान से अपने संबंध खराब करना नहीं चाहता था। इसीलिए एफबीआई को फई को गिरफ्तार करने से रोका गया था। जब अमेरिकी सेना ने आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्‍तान से खोजकर मार डाला उसके बाद से फई की गिरफ्तारी की इजाजत एफबीआई को मिल गई थी। फिलहाल अमेरिका की इस कार्रवाई से इतना साफ हो गया है कि वह सब कुछ अपने हिसाब से करता है। उसे पता था कि फई काफी समय से आईएसआई के लिए काम कर रहा था। उसके बाद भी उसने उसकी गिरफ्तारी में देरी की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भारतीय एजेंसियों के रेडार पर भी था फई &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फई पर भारतीय खुफिया एजेंसियों की नजर काफी पहले से थी। जानकारी के मुताबिक, आईबी 2007 से ही घाटी में जारी उसकी गतिविधियों नजर रखे हुआ था। कश्मीर के डीजीपी ने स्वीकार किया है कि घाटी में कई मामलों में फई का नाम आता रहा है। खासतौर पर भारत विरोधी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराने के मामले में उसकी अहम भूमिका रही है। उनका कहना है कि फई के खिलाफ बहुत सारी जानकारियां हैं। फिलहाल अमेरिकी जांच एजेंसी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जा रही है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सैयद अली शाह गिलानी और अन्य अलगाववादी नेताओं ने फई की गिरफ्तारी पर जो प्रतिक्रिया दी, उससे साफ जाहिर है कि वह कश्मीरी अलगाववादियों के बीच में कितना लोकप्रिय था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1095301817338854699?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1095301817338854699/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1095301817338854699&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1095301817338854699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1095301817338854699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/07/blog-post_28.html' title='फई के बयान से फिर बेनकाब हुआ पाक'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-4dMWOrGF4Bo/TjEIWZdADnI/AAAAAAAAAqI/ODK4OMp5KQA/s72-c/ghulam-nabi-fai.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-8396431351109682422</id><published>2011-07-01T11:28:00.003+05:30</published><updated>2011-07-05T11:20:56.495+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास'/><title type='text'>‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;किसी व्यक्ति&lt;/span&gt;, संस्था या सरकार की छवि उसके कर्मों से स्वयं ही निर्मित होती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती। छवि के आकलन का कार्य तो देश और समाज के लोगों का विशेषाधिकार है। लेकिन यदि आप अपनी और सरकार की छवि निखारने का अभियान चला रहे हैं तो इस संदर्भ में यही कहा जायेगा कि आप देश व समाज के लोगों का यह विशेषाधिकार भी छीन लेना चाहते हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्ति, संस्था या सरकार; जैसा कर्म करेगी, समाज के लोग उसका वैसा ही आकलन करेंगे। लेकिन यदि आप गलत कार्य करते हैं और फिर इसकी सफाई देते हैं कि मैं ईमानदार हूं, मेरी सरकार देशहित में कार्य कर रही है। तो आपके तर्कों को कौन मानेगा ? एक नामी चोर भी स्वयं को ईमानदार ही कहता है, तो क्या पुलिस उसका पीछा करना छोड़ देती है, कदापि नहीं। हालांकि, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह निहायत ही ईमानदार हैं, इस बात से देश के लोग भी सहमत हैं। उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यदि डॉ. सिंह ईमानदार हैं तो उनकी सरकार अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार क्यों साबित हो रही है ? और यदि सरकार भ्रष्ट है तो उनकी ईमानदारी पर शक क्यों नहीं किया जाना चाहिए ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनाब, आप स्वयं और अपनी सरकार को कर्मठ व वगैर-वगैरह कहकर क्या साबित करना चाहते हैं ? आप जैसा कहेंगे उसके अनुसार देश और समाज के लोग आपके संदर्भ में आकलन कतई नहीं करेंगे। मीडिया प्रबंधन से किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की असलियत पर पर्दा कैसे डाला जा सकता है? क्या देश की जनता मूर्ख है कि जो आप कहेंगे वही हूबहू मान लेगी? यदि ऐसा नहीं है तो छवि निखारने का यह प्रयास समय की बर्बाद के सिवाय और कुछ नहीं है ?&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-0oEHJKJD1Og/Tg1isKKg7wI/AAAAAAAAAp4/WaKFn-ntVw8/s1600/PM%2Bwith%2BEditors.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 172px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-0oEHJKJD1Og/Tg1isKKg7wI/AAAAAAAAAp4/WaKFn-ntVw8/s320/PM%2Bwith%2BEditors.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5624260020437839618" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मीडिया प्रबंधन के माध्यम से क्या आप एक भ्रष्टाचारी और अत्याचारी सरकार की छवि में चार चांद लगाना चाहते हैं? यह तो सम्भव ही नहीं है।  क्या आपके कहने का अभिप्राय यह तो नहीं कि कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार में आज तक का सबसे बड़ा घोटाला हुआ ही नहीं है? यदि यह गलत है तो तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा व उनके कुछ सहयोगी अधिकारी और डीएमके सांसद कनिमोझी तिहाड़ जेल की रोटी क्यों तोड़ रहे हैं? उन सभी आरोपियों की जमानत अर्जी विशेष न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय ने क्यों खारिज कर दी है? आपके मौजूदा कार्यकाल में जितने भी घोटाले हुए हैं उसकी जिम्मेदारी से आप कैसे बच सकते हैं?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप यदि कहेंगे कि “मैं कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं हूं।” तो आपकी बात को क्या कोई व्यक्ति सहर्ष स्वीकार लेगा? आखिर आपको मीडिया के कुछ चुनिंदा संपादकों के समक्ष बार-बार यह कहना क्यों पड़ रहा है कि “मेरी सरकार ठीक से कार्य कर रही है, देशहित में कदम उठा रही है।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार जनहित के कार्य कर रही है तो कोई ईमानदार सम्पादक अपने लेखों और सम्पादकीय में उसकी चर्चा किये बिना कैसे रह सकता है? यदि वह सम्पादक ईमानदार है तो उसकी चर्चा स्वयं की प्रेरणा से करेगा। इसके लिये किसी प्रबंधन की आवश्यकता नहीं होती। कोई कितना भी बड़ा सम्पादक क्यों न हो वह अपने लाख पृष्ठों की आलेख से भी किसी व्यक्ति की छवि को न तो परिवर्तित कर सकता है और न ही उसमें चार चांद लगा सकता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया प्रबंधन स्वयं में श्रेष्ठ उद्देश्य से किया गया एक श्रेष्ठ कार्य होता है। आप जो कहना चाहते हैं वो बातें उसी अर्थ में समाचार-पत्रों में प्रकाशित हों, उसका उचित कवरेज हो, आपकी कही गयी बातों का कहीं दूसरा अर्थ न निकाल लिया जाये, इसलिए प्रबंधन की आवश्यक होती है। बजाय इसके कि मीडिया प्रबंधन छवि निखार का जरिया बने, यह तो निरर्थक प्रयास है। मीडिया जगत के अधिकांश लोग यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि सम्पादकों के साथ डॉ. मनमोहन सिंह की बातचीत से केंद्र सरकार की छवि पर रत्ती भर भी कोई असर पड़ने वाला है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-8396431351109682422?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/8396431351109682422/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=8396431351109682422&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8396431351109682422'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8396431351109682422'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='‘छवि निखार’ के निरर्थक प्रयास'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-0oEHJKJD1Og/Tg1isKKg7wI/AAAAAAAAAp4/WaKFn-ntVw8/s72-c/PM%2Bwith%2BEditors.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-2118403517455211700</id><published>2011-06-27T17:34:00.006+05:30</published><updated>2011-06-28T11:20:36.386+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा'/><title type='text'>अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-6sNoFO6KVCM/TghyK7Gw07I/AAAAAAAAApQ/DZIAR1bMoo0/s1600/anna-hazare-Jantar%2Bmantar.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 226px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-6sNoFO6KVCM/TghyK7Gw07I/AAAAAAAAApQ/DZIAR1bMoo0/s320/anna-hazare-Jantar%2Bmantar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622869666762380210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;लोकपाल के शीघ्र निर्माण को लेकर अन्ना हजारे सहित सभी सत्पुरुष समाज की बेचैनी स्वाभाविक ही है। लेकिन जो लोकपाल इन भ्रष्ट नेताओं के कारण पिछले 43 वर्षों से कानून का रूप नहीं ले सका है, क्या वह उनकी जिद से मात्र एक या दो सप्ताह में ही कानून का रूप ले सकता है? भ्रष्टाचारमुक्त भारत का निर्माण सभी सत्पुरुष समाज की इच्छा है, लेकिन इसको लेकर चलाये जा रहे आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। धैर्य खो देने से स्थितियां बनती नहीं बल्कि और बिगड़ जाती हैं। सरकार को बार-बार अनशन करने की धमकी देकर अपने को महत्वहीन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में अनशन एक हथियार जरूर है लेकिन विधेयक निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लगने वाले समय के संदर्भ में अनशन रूपी यह हथियार क्या कर सकेगा ? लोकपाल का इंतजार करते-करते जैसे 43 वर्ष बीत गये वैसे ही केवल एक या दो महीने और रुक जाने में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन करके केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस चार दिवसीय अनशन ने उनको और देश को बहुत कुछ दिया है। उन्होंने मात्र इतने दिन में ही अपने लिए वह दर्जा हासिल कर लिया है जो लोग जीवन भर संघर्ष करके भी नहीं पाते। फिर भी अन्ना को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। उनको यह सोचना चाहिए कि अनशन की एक सीमा व मर्यादा है और देशवासियों की मर्यादित इच्छा ही लोकतंत्र है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना जैसे लोगों को देश के लिए मरने से बेहतर विकल्प जीवित रहकर देश की सेवा करना है। क्योंकि ऐसे लोग बिरले ही होते हैं। अनशन की जिद में अपना प्राणोत्सर्ग कर देना कहीं की बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी। यह चर्चा इसलिए आवश्यक प्रतीत हो रही है क्योंकि अन्ना ने 16 अगस्त से पुन: अनशन करने की घोषणा की है। लेकिन लोकपाल पर सरकार के रूख को देखते हुए अन्ना को यह समझना चाहिए कि इस बार केंद्र सरकार के कर्ता-धर्ता; उनको पहले अनशन जैसा महत्व नहीं देंगे। सरकार का इस प्रकार का संभावित रुख; लोकपाल विधेयक मसौदा समिति के सरकारी सदस्य तथा केंद्रीय जल संसाधन विकास मंत्री सलमान खर्शीद के जमशेदपुर में सोमवार को दिये उस बयान से भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था- “अन्ना हजारे अगर 16 अगस्त से अनशन करते हैं तो यह सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था (संसद) का विरोध होगा। और इसके बाद उनका क्या हश्र होगा, यह नहीं कहा जा सकता।”  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं ऐसा न हो कि अपने दूसरे अनशन के दौरान अन्ना की हालत ज्यादा बिगड़ जाये और सरकार की नाक पर जूँ तक न रेंगे। ऐसी स्थिति में अन्ना को अपना अनशन तोड़ने के लिए कहीं बीच का रास्ता न अख्तियार करना पड़ जाये। यदि ऐसा होगा तो अन्ना अपनी जिद के कारण कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस अभियान को ही चोट पहुंचायेंगे। जैसे योग गुरू स्वामी रामदेव रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस के दमनात्मक कार्रवाई को देखकर महिलाओं की लिबास पहनकर अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए थे। नेतृत्वकर्ताओं का ऐसा आचरण किसी भी आंदोलन की धार को कमजोर करता है, साथ ही उनके प्रति जनता के विश्वास को भी कम करता है। जो लोग नेतृत्वकर्ता हैं उनको अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने पीछे खड़ी जनता और आंदोलन की दीर्घकालिक रणनीति; पर विशेष ध्यान देना चाहिए।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-gVPyiCiYqkw/TghyBTlcfKI/AAAAAAAAApI/gMS4sTO2Vpc/s1600/baba-ramdev.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 238px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-gVPyiCiYqkw/TghyBTlcfKI/AAAAAAAAApI/gMS4sTO2Vpc/s320/baba-ramdev.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622869501534829730" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे आजादी के बाद से अनशन करते कई लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार में शामिल कुछ लोग चाहेंगे कि अनशन करते अन्ना अपनी मौत मर जायें, साथ ही यह आंदोलन भी अधमरा हो जाये ! उनका मरना कतई देशहित में नहीं कहा जा सकता। बार-बार अनशन की धमकी देने से बेहतर लोकतांत्रिक विकल्प नगर, ग्राम, डगर-डगर जाकर जनता को जागृत करना हो सकता है। उनके इस कदम से सरकार ज्यादा भयभीत होगी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश की 121 करोड़ की आबादी में से मात्र पांच सदस्यों वाली कथित सिविल सोसायटी के सदस्य देश की किस संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनका देश की जनता के प्रति उत्तरदायित्व क्या है? हालांकि जब कोई व्यक्ति देश और समाज के हित में श्रेष्ठ उद्देश्यों को लेकर संघर्ष करता है तो समाज के ही लोग कई प्रकार की बातें करने लगते हैं, लेकिन ध्येय-पथ के अनुगामी को इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रकार की बातों में कोई दम नहीं होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना कि अन्ना और उनके द्वारा उठाये गये कालेधन व भ्रष्टाचार के मुद्दों में दम है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि आप संसदीय परम्पराओं की इज्जत मत करिये। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में अंग्रेजों के विरुद्ध सैकड़ों आंदोलन चलाये और जेल की यातनायें सहीं, लेकिन उन्होंने इस संदर्भ में हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखा, जबकि वह भलीभांति जानते थे कि अंग्रेज हर तरह से अमर्यादित आचरण कर रहे हैं। इस संदर्भ में महात्मा गांधी के अनुयायी अन्ना; गांधी से क्यों नहीं सीखते हैं ? यदि गांधी से प्रेरणा लें तो कालेधन और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए चलाये जा रहे इस अभियान को और बल ही मिलेगा, जो इस भ्रष्टाचारी व अत्याचारी केंद्र सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-2118403517455211700?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/2118403517455211700/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=2118403517455211700&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2118403517455211700'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2118403517455211700'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='अनशन की लोकतांत्रिक मर्यादा'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-6sNoFO6KVCM/TghyK7Gw07I/AAAAAAAAApQ/DZIAR1bMoo0/s72-c/anna-hazare-Jantar%2Bmantar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3398409125586411983</id><published>2011-05-20T19:06:00.005+05:30</published><updated>2011-05-20T19:24:55.906+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार'/><title type='text'>गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-qkKOuUYzK4Q/TdZu1z_oI-I/AAAAAAAAAo0/xXnI82zyOBk/s1600/UNO.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 195px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-qkKOuUYzK4Q/TdZu1z_oI-I/AAAAAAAAAo0/xXnI82zyOBk/s200/UNO.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608792256705733602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद &lt;/span&gt; &lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सत्ता &lt;/span&gt;के संचालन की लोकतांत्रिक प्रणाली; इस सृष्टि की सर्वोच्च शासन व्यवस्था मानी गई है। क्योंकि अब तक शासन के संचालन की जितनी भी पद्धतियां ज्ञात हैं उनमें लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वाधिक मानवीय होने के कारण सर्वोत्कृष्ट है। यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें इकाई राज्य के सभी जन की सहभागिता अपेक्षित है। इस तंत्र में न तो कोई आम है और न ही कोई खास, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता की निगाह में सभी समान हैं। लोकतांत्रिक देश यानी सभी जन की सहभागिता से निर्मित तंत्र। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत इस सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली का जन्मदाता है। कुछ लोग ब्रिटेन को भी मानते हैं; पर यह सत्य नहीं है, भले ही भारत को आजादी मिलने तक देश के सभी रियासतों में राजतंत्र रहा हो और इस राजतांत्रिक पद्धति से सत्ता संचालन का सिलसिला अयोध्या के राजा दशरथ के शासनकाल के बहुत पहले से चलता रहा हो, फिर भी जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही के परिप्रेक्ष्य में भारत ही लोकतांत्रिक प्रणाली का जन्मदाता कहा जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दशरथ पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम राम का शासन राजतांत्रिक होते हुए भी लोकतांत्रिक था। क्योंकि उनके राज्य की सत्ता जनता के प्रति पूर्ण-रूपेण जवाबदेह थी। उनकी पत्नी सीता पर अयोध्या के मात्र एक व्यक्ति ने आलोचना की थी, राजा राम ने इसको गंभीरता से लिया और राजधर्म का पालन करते हुए सीता को जंगल में भेज दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि राम ने सीता के प्रति अपने पति धर्म का पालन किया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आलोचना करने वाले की संख्या मात्र एक थी, फिर भी कार्रवाई कठोर हुई। उनके जैसा संवेदनशील राजतंत्र अब तक देखने या सुनने को नहीं मिला है। वह एक ऐसा तंत्र था जो लोकतंत्र से भी बढ़कर था। हांलाकि, राज्य के राजा का चयन सत्ता उत्तराधिकार की अग्रजाधिकार विधि के तहत होता था। यानी राजा का ज्येष्ठ पुत्र सत्ता का उत्तराधिकारी। उस समय मतदान प्रक्रिया की कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि यदि किसी इकाई राज्य की सत्ता, उस इकाई राज्य की जनता द्वारा चुनी गई हो, जनता के हित में कार्य करती हो और जनता के लिए समर्पित हो; तो ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक कह सकते हैं। लिंकन के कहने का अर्थ यह भी है कि सरकार के निर्माण या चयन में लोकतांत्रिक इकाई के सभी लोगों की समान सहभागिता होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने को तो अमेरिका लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार है लेकिन वह भी वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के महत्पूर्ण घटक सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण स्थापना के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है। यूएनओ को वैश्विक सत्ता कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि भारत सहित दुनिया के मात्र 192 देशों को ही यूएनओ की सदस्यता प्राप्त है, फिर भी इसकी सत्ता को वैश्विक सत्ता कहना ज्यादा समीचीन होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में सुरक्षा परिषद के सदस्यों की संख्या 15 है। इनमें से पांच- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन; स्थाई सदस्य हैं, जबकि 10 देशों की सदस्यता अस्थाई है। इन अस्थाई सदस्यों में भारत भी शामिल है। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। स्थाई सदस्यों को वीटो का अधिकार प्राप्त है। यह वीटो अधिकार ही सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की स्थापना की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। क्या आप कुछ सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार देकर लोकतांत्रिक सत्ता स्थापित कर सकते हैं, यह कदापि संभव नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर सुरक्षा परिषद में लोकतंत्र की पूर्ण-रूपेण स्थापना के लिए अमेरिका कोई पहल क्यों नहीं करता? क्या वह सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्य देशों को मिले वीटो के अधिकार को बनाए रखना चाहता है और शेष अस्थाई सदस्य देशों को अस्थाई के नाम पर इस अधिकार से दूर रखना चाहता है? क्या यही अमेरिका की लोकतंत्रिक सोच है। हालांकि यह पहल चीन से करना बेमानी है क्योंकि उसकी सोच गैर-लोकतांत्रिक है। अमेरिका को यह महत्वपूर्ण पहल इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि वह सोवियत संघ के विघटन के बाद एक-ध्रुवीय विश्व का इकलौता नेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत भी सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए अभियान चलाए हुए है। इससे उसको क्या हासिल होगा। कुछ विशेष सहूलियत मिल सकती है। महासभा के सदस्य देशों या विश्व के अन्य देशों के लिए वैश्विक नीति-निर्माण की दिशा में मत देने का अधिकार मिल सकता है, लेकिन इससे क्या वह संयुक्त राष्ट्र महासभा के 192 सदस्यों में से पांच देशों- अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन, को छोड़कर शेष 187 देशों का स्वाभाविक नेता बना रह सकता है। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के बजाए भारत को परिषद के मानक को पूरा करने वाले सभी सदस्य देशों के लिए समान अधिकार की सदस्यता के निमित्त अभियान चलाना चाहिए। भारत का यह प्रयास यूएनओ की सुरक्षा परिषद सहित विश्व के सभी देशों में लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने की दिशा में अहम सिद्ध होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3398409125586411983?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3398409125586411983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3398409125586411983&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3398409125586411983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3398409125586411983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html' title='गैर-लोकतांत्रिक है सुरक्षा परिषद का ‘वीटो’ अधिकार'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-qkKOuUYzK4Q/TdZu1z_oI-I/AAAAAAAAAo0/xXnI82zyOBk/s72-c/UNO.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-7567415107930040709</id><published>2011-05-18T19:54:00.003+05:30</published><updated>2011-05-18T19:58:20.014+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’'/><title type='text'>राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-lBQnilQ5jAY/TdPXLOfPrgI/AAAAAAAAAos/Uq2bfOJfiFE/s1600/Rahul%2BGandhi.jpeg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 192px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-lBQnilQ5jAY/TdPXLOfPrgI/AAAAAAAAAos/Uq2bfOJfiFE/s200/Rahul%2BGandhi.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608062548874079746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सचिव वैद्य, गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। &lt;br /&gt;राजधर्म तनु तीनि कर होईं बेगहिं नास॥ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अर्थात&lt;/span&gt;-‘जिस राजा के सचिव, वैद्य और गुरू राजा के भयवश या उसे खुश रखने के लिए उसके सम्मुख उसके मन की और चिकनी-चुपड़ी बातें बोलते हों, उस राजा के राज्य, शरीर और धर्म का सर्वनाश हो जाता है।’ (रामचरितमानस)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी प्रकार, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी के एक ऐसे सचिव प्रतीत हो रहे हैं; जो केवल अपने नेता को प्रसन्न रखने के लिए ही बोलता है। दिग्विजय जैसे अपने सचिव सदृश व्यक्ति के बचनों में राहुल को सत्य दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो राहुल दिग्विजय के तर्कों के आधार पर ग्रेटर नोएडा के भट्टा व पारसौल गांव के संदर्भ में 74 लोगों को मारे जाने का दावा क्यों करते ? भट्टा व पारसौल गांव में जो कुछ भी दिग्विजय ने पत्रकारों से कहा था, वही बातें राहुल ने प्रधानमंत्री के समक्ष दुहरायी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, इस मामले को लेकर राहुल सोमवार को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने दिग्विजय की बातों को ही दुहराया। उन्होंने डॉ. सिंह से कहा कि भट्टा व पारसौल में कम से कम 74 शवों की राख बिखरी पड़ी है। उन्होंने दावा किया कि इसके बारे में गांव के सभी लोगों को जानकारी है। राहुल ने पुलिस कार्रवाई में कथित रूप से जले हुए शव और किसानों एवं उनके परिवार के लोगों के खिलाफ हिंसा की तस्वीरें भी दिखाई थी। उन्होंने कई स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार होने की बात भी दुहरायी और यह भी कहा था कि स्थानीय लोगों की निर्ममता से पिटाई की गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन राहुल के इन दावों की हवा निकलती दिख रही है। दोनों गांवों में से एक भी व्यक्ति राहुल के दावों की पुष्टि करने को तैयार नहीं है। भट्टा व पारसौल गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने महिलाओं से बलात्कार संबंधी खबरें सुनी है लेकिन वे इसका दावा नहीं कर सकते। इस संदर्भ में ग्रामीण सिर्फ इतना ही बता रहे हैं कि पुलिस ने उनकी पिटाई की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदित हो कि 11 मई को राहुल गांधी प्रशासन को धता बताते हुए बाइक पर सवार होकर भट्टा व पारसौल पहुंचे थे। इस दौरान काफी राजनीतिक ड्रामा हुआ था। उनका साथ देने दिग्विजय सिंह भी उपस्थित थे। कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई थी। वहां से लौटने के बाद सोमवार को राहुल ने 8 स्थानीय लोगों के साथ प्रधानमंत्री डॉ. सिंह से मुलाकात की। इन 8 स्थानीय लोगों में वीरेन्द्री देवी भी शामिल थी। वीरेन्द्री का कहना है कि उसे ऐसी किसी महिला के बारे में जानकारी नहीं है जिसके साथ दुष्कर्म हुआ हो। वीरेन्द्री ने बताया कि पुलिस ने कुछ महिलाओं की पिटाई जरूर की थी। पुलिस ने उसकी बेटी खुशबू की भी पिटाई की थी। वीरेन्द्री ने बताया कि उसने प्रधानमंत्री को यह नहीं बताया था कि भट्टा व पारसौल गांव से मिली राख में हडि्डयां मिली थी। वीरेन्द्री ने यह भी कहा कि वह प्रधानमंत्री के साथ अंग्रेजी में हो रही बातचीत को समझ नहीं पाई। आश्चर्य की बात यह है कि राहुल के साथ प्रधानमंत्री से मिलने वाले 8 किसानों में से 7 भूमिगत हो गये हैं।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-iHU_b73MIHs/TdPW96LQojI/AAAAAAAAAok/55g_wX2gtso/s1600/Rahul%2BGandhi%2B2.jpeg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 284px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-iHU_b73MIHs/TdPW96LQojI/AAAAAAAAAok/55g_wX2gtso/s320/Rahul%2BGandhi%2B2.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608062320083247666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल के इन दावों के बाद गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन भी हरकत में आ गया और भट्टा व परसौल गांवों से मंगलवार को राख के कुछ सैंपल एकत्रित कर जांच के लिए आगरा भेजे गये। मेरठ के कमिश्नर भुवनेश्वर कुमार ने बताया कि गांव के पांच स्थानों से राख का सैंपल केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला इसलिए भेजा गया है; ताकि उसमें विस्फोटकों की जांच हो सके। हालांकि, उन्होंने इस जांच के पहले ही कह दिया कि राख में मानव कंकाल मिलने से संबंधित आरोप बेबुनियाद हैं। हालांकि सत्यता क्या है, जांच रिपोर्ट आने के बाद स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। मेरठ के पुलिस महानिरीक्षक ने कहा कि गांव का कोई भी सदस्य गायब नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि 23 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 17 घायल हैं और दो की मौत हो गई है। इसके अलावा सभी लोग गांव में ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं, कांग्रेस राहुल के समर्थन में खड़ी हो गई है। पार्टी का कहना है कि किसानों पर पुलिस फायरिंग मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए। किसानों को जब तक न्याय नहीं मिलेगा, कांग्रेस अपना आंदोलन बंद नहीं करेगी। विदित हो कि ग्रेटर नोएडा के किसान अपनी जमीनों की मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पिछले करीब 4 महीने से गांव में धरने पर बैठे थे। धरनारत किसानों ने रोडवेज के कुछ कर्मचारियों को बंधक बना लिया था। प्रशासन बंधकों को मुक्त कराने के लिए 7 मई को भट्टा पारसौल गांव पहुंचा था, इसी दौरान किसानों व सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसमें पीएसी के 2 जवानों सहित चार लोगों की मौत हो गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि “कांग्रेस का भविष्य” और देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले राहुल गांधी क्या अपनी पार्टी के विनाश तक दिग्विजय जैसे लोगों के कर्णप्रिय लगने वाले वचनों को सुनते रहेंगे; या फिर कुछ अपनी भी बुद्धि लगायेंगे। क्योंकि निराधार और “तोतारटंत” बातें व्यक्ति की छवि तो बिगाड़ती ही हैं, विनाश की ओर भी उन्मुख करती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-7567415107930040709?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/7567415107930040709/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=7567415107930040709&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7567415107930040709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7567415107930040709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/05/blog-post_18.html' title='राहुल गांधी का हवा-हवाई ‘दिग्विजयी दावा’'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-lBQnilQ5jAY/TdPXLOfPrgI/AAAAAAAAAos/Uq2bfOJfiFE/s72-c/Rahul%2BGandhi.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-8525746991536852274</id><published>2011-05-15T15:57:00.005+05:30</published><updated>2011-05-15T16:02:18.609+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’'/><title type='text'>डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-pqWwwhB_g5I/Tc-qs-I2xBI/AAAAAAAAAoU/qZtvJ9Kb660/s1600/Dr%2BVed%2BPrakash%2BNanda%2B2.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 185px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-pqWwwhB_g5I/Tc-qs-I2xBI/AAAAAAAAAoU/qZtvJ9Kb660/s200/Dr%2BVed%2BPrakash%2BNanda%2B2.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5606887750670664722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद, नई दिल्ली।&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;अमेरिका के डेन्वेर विश्वविद्यालय में विधि विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वर्ल्ड ज्यूरिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को “छठा भारतवंशी गौरव सम्मान” से सम्मानित किया गया। डॉ. नन्दा को यह सम्मान दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित मालवीय भवन के सभागार में शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी ने प्रदान किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम का आयोजन अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के तत्वावधान में किया गया था। इस दौरान मुख्य रूप से पूर्व राज्यपाल केदारनाथ साहनी, पूर्व पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री संतोष गंगवार, वरिष्ठ पत्रकार अशोक टण्डन, दिल्ली की मेयर प्रो. रजनी अब्बी, मृदुला सिन्हा, मीडिया नैपुण्य संस्थान के निदेशक आशुतोष भटनागर, भाजपा नेता विजय जौली, पी.एन. पाठक सहित कई गण्यमान्य उपस्थित थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. नन्दा ने अमेरिका में प्रवासी भारतीयों के बीच भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वह विदेशों में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं। इसके अलावा अभी हाल ही में वह इण्डियन लॉ टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान से सम्मानित किये जा चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. नन्दा ‘लॉ जर्नल’ व ‘नेशनल मैगजीन’ का प्रकाशन भी करते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून पर उनकी 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ‘डेन्वेर पोस्ट’ के नियमित स्तम्भकार हैं। उन्होंने बीबीसी व वॉयस ऑफ अमेरिका सहित विश्व के विभिन्न रेडियो व टीवी चैनलों पर समीक्षक के नाते भी अपनी विशेष पहचान बनायी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के द्वारा प्रदान किया जाता है। यह देश की पहली ऐसी संस्था है जो विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों से संबंध स्थापित करने और भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रचार-प्रसार का कार्य करती है। इसकी स्थापना वर्ष 1960 में वरिष्ठ पत्रकार एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ श्री बालेश्वर अग्रवाल ने की। 94 वर्षीय श्री अग्रवाल परिषद के संस्थापक अध्यक्ष और जे.सी. शर्मा अध्यक्ष हैं। संस्था का केंद्रीय कार्यालय दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रवासी भवन में है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-nY8CZtvLrAg/Tc-qzNplPzI/AAAAAAAAAoc/hoocgam9D1M/s1600/ASRP.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 239px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-nY8CZtvLrAg/Tc-qzNplPzI/AAAAAAAAAoc/hoocgam9D1M/s320/ASRP.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5606887857913675570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पुरस्कार का चयन उच्चस्तरीय समिति के द्वारा किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ, फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी, त्रिनिडाड के पूर्व प्रधानमंत्री बासुदेव पाण्डेय, पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री एवं जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, दैनिक जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के संस्थापक अध्यक्ष बालेश्वर अग्रवाल, जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड के एमडी सुभाष चन्द्रा, वरिष्ठ पत्रकार मनोहर पुरी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग न्यास के सचिव विजेंद्र मित्तल और नरेश गुप्ता शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदित हो कि संस्था के द्वारा ‘पहला भारतवंशी गौरव सम्मान’ 25 अक्टूबर 2005 को दक्षिण अफ्रीका निवासी श्री रणजीत रामनारायण को प्रदान किया गया था। उनको यह पुरस्कार मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री नवीनचंद्र रामगुलाम ने प्रदान किया था। ‘दूसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ त्रिनिदाद व टोबैगो निवासी श्री सत्यनारायण महाराज को 23 दिसम्बर 2006 को पूर्व प्रधानमंत्री श्री इंदर कुमार गुजराल ने प्रदान किया था। ‘तीसरा भारतवंशी गौरव सम्मान’ ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन ऑफ पीपुल्स ऑफ इण्डिया (जीओपीआईओ) के चेयरमैन डॉ. थामस अब्राहम को 4 जनवरी 2008 को तत्कालीन उप-राष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत ने प्रदान किया था। &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;‘चौथा भारतवंशी गौरव सम्मान’ मॉरीशस के ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट (एचएसटी) नामक गैर-सरकारी संगठन को 11 जनवरी 2009 को पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने प्रदान किया था और ‘5वां भारतवंशी गौरव सम्मान’ थाईलैंड के श्री शिवनाथ राय बजाज को 10 जनवरी 2010 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने प्रदान किया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-8525746991536852274?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/8525746991536852274/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=8525746991536852274&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8525746991536852274'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/8525746991536852274'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/05/blog-post_15.html' title='डॉ. वेद प्रकाश नन्दा को ‘छठा भारतवंशी गौरव सम्मान’'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-pqWwwhB_g5I/Tc-qs-I2xBI/AAAAAAAAAoU/qZtvJ9Kb660/s72-c/Dr%2BVed%2BPrakash%2BNanda%2B2.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1821696329111054008</id><published>2011-05-12T17:10:00.001+05:30</published><updated>2011-09-05T18:39:25.894+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><title type='text'>'कुरूक्षेत्र' बना ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-FL604Z2cuAE/TcvIEGXMaJI/AAAAAAAAAoI/jHKu0a3RqDQ/s1600/rahulgandhi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 227px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-FL604Z2cuAE/TcvIEGXMaJI/AAAAAAAAAoI/jHKu0a3RqDQ/s320/rahulgandhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5605794133945641106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव&lt;/span&gt; इन दिनों उत्तर प्रदेश के राजनीतिक महाभारत का कुरूक्षेत्र बना हुआ है। इस महाभारत में कौरवों का पक्ष कौन है, यह पहचानना बड़ा ही कठिन है, क्योंकि सभी अपने को पाण्डव होने का ही दावा कर रहे हैं। सभी राजनीतिक दलों के नेता इस कुरूक्षेत्र में पहुंचकर केवल ‘अग्निबाण’ चलाने पर आमादा हैं। इस मामले के हल से उनका कुछ भी लेना देना नहीं। केवल अगले चुनाव में वोट का जुगाड़ हो जाय, इस महाभारत का एकमेव लक्ष्य है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असली महाभारत तो कौरवों और पाण्डवों के बीच हुआ था, लेकिन वर्तमान का यह राजनीतिक महाभारत केवल कौरवों के बीच ही होता दिख रहा है। क्योंकि जिस प्रकार इस आंदोलन के सहारे पार्टियों में राजनीतिक बढ़त पाने की होड़ मची हुई है, उससे केवल यही उपमा समीचीन है। यहां न कोई पाण्डव है और न ही कोई कृष्ण, जो अर्जुन को गीता का उपदेश देकर धर्मपथ पर चलते हुए कर्मक्षेत्र में डटे रहने के लिए प्रेरित करे। सबको ऐन-केन-प्रकारेण ‘हस्तिनापुर’ की सत्ता ही दिख रही है। बस, वही लक्ष्य है। किसानों का दुःख-दर्द जाये भाड़ में।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1821696329111054008?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1821696329111054008/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1821696329111054008&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1821696329111054008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1821696329111054008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/05/blog-post_5040.html' title='&apos;कुरूक्षेत्र&apos; बना ग्रेटर नोयडा का भट्टा पारसौल गांव'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-FL604Z2cuAE/TcvIEGXMaJI/AAAAAAAAAoI/jHKu0a3RqDQ/s72-c/rahulgandhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1599335452567711976</id><published>2011-05-10T12:19:00.007+05:30</published><updated>2011-05-10T15:58:36.543+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रीराम-जन्मभूमि'/><title type='text'>‘जो मांगा नहीं गया, वो दिया भी नहीं जा सकता’</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-27m2d1OFgbo/TcjhRbBF5PI/AAAAAAAAAnw/wpZKS1sPj0c/s1600/Supreme%2BCourt.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 178px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-27m2d1OFgbo/TcjhRbBF5PI/AAAAAAAAAnw/wpZKS1sPj0c/s200/Supreme%2BCourt.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5604977425688945906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महामंत्री श्री चम्पत राय &lt;/span&gt;ने श्रीराम-जन्मभूमि के स्वामित्व विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय के सोमवार के आदेश पर संतोष व्यक्त किया है। उन्होंने एक बाचतीत के दौरान यह उम्मीद जतायी कि स्वामित्व विवाद मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय में श्रीराम-जन्मभूमि के स्वामित्व विवाद मामले में 30 सितम्बर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के निर्णय के विरुद्ध दायर सभी अपीलों की सोमवार को सुनवाई हुई। ध्यातव्य है कि स्वामित्व विवाद संबंधी निर्णय के विरुद्ध शीर्ष न्यायालय में यह प्रथम अपील है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा की दो सदस्यीय पीठ कर रही है। सोमवार को सुनवाई प्रारम्भ होते ही पीठ ने स्वतःस्फूर्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अत्यंत चौंकाने वाला मामला है कि उच्च न्यायालय की त्रि-सदस्यीय पूर्ण पीठ ने भूमि का तीन भागों में बंटवारा कर दिया, जबकि मूलवाद में किसी भी पक्ष ने बंटवारे की बात कही ही नहीं थी और न इसकी मांग की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यायालय ने कहा, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"जो मांगा नहीं गया वह दिया भी नहीं जा सकता।"&lt;/span&gt; यह टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने सभी अपीलें सुनवाई के लिए स्वीकार लीं और भूमि के बंटवारे संबंधी उच्च न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यायालय ने श्रीरामलला की पूजा-अर्चना यथावत चलते रहने का आदेश भी दिया। हालांकि, इस मामले में जो अभी तक पक्षकार नहीं थे; परन्तु उन्होंने शीर्ष न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिये थे, उनकी अपील पर न्यायालय ने आज की सुनवाई के दौरान संज्ञान नहीं लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यातव्य है कि 30 सितम्बर 2010 का निर्णय यद्यपि उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों का निर्णय था, तथापि मुकदमों की मौलिक सुनवाई होने के कारण उच्च न्यायालय की वह पीठ ट्रायल कोर्ट की तरह व्यवहार कर रही थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1599335452567711976?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1599335452567711976/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1599335452567711976&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1599335452567711976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1599335452567711976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='‘जो मांगा नहीं गया, वो दिया भी नहीं जा सकता’'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-27m2d1OFgbo/TcjhRbBF5PI/AAAAAAAAAnw/wpZKS1sPj0c/s72-c/Supreme%2BCourt.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-5537476351918518362</id><published>2011-04-27T19:01:00.002+05:30</published><updated>2011-04-27T19:23:25.938+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?'/><title type='text'>अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-fr5AC6ArXzI/Tbga_VfJuXI/AAAAAAAAAnA/iYl1HAVINJo/s1600/Anna-Hazare-.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 258px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-fr5AC6ArXzI/Tbga_VfJuXI/AAAAAAAAAnA/iYl1HAVINJo/s320/Anna-Hazare-.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5600255812037097842" /&gt;&lt;/a&gt;भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए अकेला बेचारा बूढ़ा अन्ना क्या कर सकेगा। क्योंकि यह भ्रष्टाचार अत्र, तत्र, अन्यत्र और सर्वत्र विराजमान है, यानी दसों दिशाओं में व्याप्त है। इसका दायरा बहुत व्यापक है। यह केवल नेताओं तक ही सीमित नहीं है। जहां देखो वहीं भ्रष्ट लोग और भ्रष्टाचार दिखायी व सुनाई देता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल भी क्या कर सकेगा। किसी व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण को आप केवल कानून बनाकर कैसे बदल देंगे। क्या यह संभंव है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार मन का विषय है और कहते हैं कि मन बड़ा चंचल होता है। इसके प्रादुर्भाव का कारण मनोमालिन्यता, मनोवाद, मनोविकार, मनोव्याधि, मनोभ्रंश, मनोदशा और मनोग्रंथि है। आप कानून बनायेंगे तो यह मानव मन उसकी भी काट ढूंढ लेगा। तब आप क्या कर सकेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना ने जब अनशन किया तो हजारों लोग दिल्ली के जंतर मंतर पर उनके समर्थन में पहुंच गये। देशभर में उनके समर्थन में लोग अनशन करने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये सभी महानुभाव लोग दूध के धुले हैं और इन सभी ने अपने जीवन में कभी भी भ्रष्टाचार नहीं किया है, या अब से नहीं करने की ठान ली है। इस भीड़ में कई ऐसे लोग भी शामिल थे जिनको बिजली के मीटर को सुस्त करने में महारत हासिल है, ताकि बिजली बिल कम देना पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार के कितने प्रकार हैं, आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। हर घंटे एक भिन्न प्रकार का भ्रष्टाचार और उसको अंजाम तक पहुंचाने का तरीका पनप रहा है। यात्रा के दौरान ट्रेन की सीट कन्फर्म न होने या टिकट वेटिंग में होने पर हम प्रयास करने लगते हैं कि टिकट परीक्षक किसी भी प्रकार से ले-देकर एक सीट का जुगाड़ कर दे, ताकि रात को हम चैन की नींद ले सकें। इसके लिए हम दूसरे का हक भी मारने को तैयार हो जाते हैं। यह भी तो एक प्रकार का भ्रष्टाचार ही है। यात्रा के दौरान ट्रेन में यह हर रोज और हर क्षण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेहूँ की कम्बाईन से कटाई के कारण मवेशियों के लिये भूसे की पर्याप्त कमी हो जा रही है। इसके कारण भूसा गेहूँ से भी महंगे दामों पर बिक रहा है। भूसे की उपलब्धता बाजार में भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह बात चायखाने की चर्चा का विषय है कि गेंहूँ की कम्बाइन से कटाई पर जिलाधिकारी (डीएम) ने रोक लगा दी है, ताकि भूसे की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। जिलाधिकारी के इस आदेश के पालन के लिए उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) और तहसीलदार साहब गांव-गांव का दौरा कर रहे हैं। इस नये आदेश के बाद एक और भ्रष्टाचार उत्पन्न हो गया है। ‘सरकारी साहब’ लोग गेहूँ की कटाई कम्बाइन से होने देने के लिए कम्बाइन मालिकों से मोटी रकम वसूल रहे हैं और जो कम्बाइन मालिक रकम देने से इन्कार कर रहे हैं उनको डीएम का फरमान सुना दे रहे हैं। हालांकि, इन सब बातों में कितनी सत्यता है, यह जांच का विषय है। लेकिन यह भी एक भ्रष्टाचार ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भ्रष्टाचार के कारण ही ‘शुद्ध’ शब्द ज्यादा प्रचलित हुआ है। आप जहां कहीं भी जायें; लिखा रहता है- “यहां हर सामान शुद्ध मिलता है; यथा- शुद्ध दूध, शुद्ध घी, शुद्ध मिठाई इत्यादि।” प्रश्न यह उठता है कि दूध, दही, घी, मिठाई और भी अन्य सामग्रियां क्या स्वयं में शुद्ध नहीं होतीं कि इसको प्रमाणित करने के लिए शुद्ध लिखना पड़ रहा है, या कुछ मिलावट के बाद ही ये सामग्रियां शुद्ध होती हैं। बात साफ है- ‘मिलावट रूपी भ्रष्टाचार’ का प्रमाणन ही शुद्ध शब्द लिख कर किया जाने लगा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्वाला डंके की चोट पर एक ही दूध को कई दामों पर बेचता है। पूछने पर वह कहता है कि कम दाम वाले दूध में अधिक पानी और अधिक दाम वाले में कम पानी मिलाया गया है। यदि आप पूछेंगे कि बिना पानी वाला दूध कौन सा है, तो वह दूध का एक दूसरा डिब्बा आपको थमा देगा और कहेगा- “बाबूजी, इसमें तनिक भी पानी नहीं मिलाया गया है, इसीलिये इसका दाम ऊंचा है।” ये ‘मिलावटी भ्रष्टाचार’ हम लोग रोज देखते व सुनते हैं और सहन भी करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार का दीमक सर्वत्र विराजमान है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बावजूद भी &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस सृष्टि में कभी भी असत् की सत्ता नहीं रही है और सत् का कभी अभाव नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव तत्वदर्शियों ने किया है। (श्रीमद्भगवद्गीता)।&lt;/span&gt; फिलहाल, चाहे जो हो लेकिन हर युग में भ्रष्टाचार की व्याप्ति रही है। कभी कम तो कभी कुछ ज्यादा। लेकिन वर्तमान भारत में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। इसलिए सत्पुरूष समाज घबराया हुआ है। हालांकि, इसका समूल उन्मूलन कभी भी नहीं किया जा सका है। फिर भी सत्पुरूष समाज सदैव इसके उन्मूलन के लिए कटिबद्ध रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि यदि हम सदैव अच्छे की कामना करें तो इसमें बुरा क्या है? करना भी चाहिए। हालांकि भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए वर्तमान का जो संघर्ष है उसका लक्ष्य कानून बनाकर भ्रष्टाचारियों में भय पैदा करने की है। यह भी एक अच्छी सोच है। भय बिनु होय न प्रीति...। यह भय तब और प्रभावी होगा जब इसके समर्थन में सहस्रों हाथ उठेंगे। अतः भ्रष्टाचार उन्मूलन के इस अभियान में हम सबको आत्मपरिष्कार के मार्ग का वरण करते हुए सक्रिय होकर प्राण-प्रण से लगना चाहिए, तभी भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-5537476351918518362?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/5537476351918518362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=5537476351918518362&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5537476351918518362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5537476351918518362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/04/blog-post_27.html' title='अकेला अन्ना बेचारा क्या कर सकेगा?'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-fr5AC6ArXzI/Tbga_VfJuXI/AAAAAAAAAnA/iYl1HAVINJo/s72-c/Anna-Hazare-.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-1160323592674644699</id><published>2011-04-18T15:13:00.002+05:30</published><updated>2011-04-26T19:21:36.244+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकपाल बिल बनाम लोक व तंत्र की मर्यादा'/><title type='text'>लोकपाल बिल बनाम लोक व तंत्र की मर्यादा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सत्ता के&lt;/span&gt; संचालन की लोकतांत्रिक प्रणाली; इस सृष्टि की सर्वोच्च शासन व्यवस्था मानी गई है। क्योंकि अब तक शासन के संचालन की जितनी भी पद्धतियां ज्ञात हैं, उनमें लोकतांत्रिक प्रणाली सर्वाधिक मानवीय है। यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें इकाई राज्य के सभी जन की सहभागिता अपेक्षित है। इस तंत्र में न तो कोई आम है और न ही कोई खास, बल्कि लोकतांत्रिक सत्ता की दृष्टि में सभी समान हैं। लोकतांत्रिक देश यानी सभी जन की सहभागिता से निर्मित तंत्र। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत इस सर्वोत्कृष्ट शासन प्रणाली का जन्मदाता है। कुछ लोग ब्रिटेन को भी मानते हैं; पर यह सत्य नहीं है, भले ही भारत को आजादी मिलने तक देश के सभी रियासतों में राजतंत्र रहा हो और इस राजतांत्रिक पद्धति से सत्ता संचालन का सिलसिला अयोध्या के राजा दशरथ के शासनकाल के बहुत पहले से चलता रहा हो, फिर भी जनता के प्रति सत्ता की जवाबदेही के परिप्रेक्ष्य में भारत ही लोकतांत्रिक प्रणाली का जन्मदाता कहा जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दशरथ पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम राम का शासन राजतांत्रिक होते हुए भी लोकतांत्रिक था। क्योंकि उनके राज्य की सत्ता जनता के प्रति पूर्ण-रूपेण जवाबदेह थी। उनकी पत्नी सीता की आलोचना अयोध्या के मात्र एक व्यक्ति ने की थी, राजा राम ने इसको गंभीरता से लिया और राजधर्म का पालन करते हुए सीता को जंगल में भेज दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि राम ने सीता के प्रति अपने पति धर्म का पालन किया या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि आलोचना करने वाले की संख्या मात्र एक थी, फिर भी कार्रवाई कठोर हुई। उनके जैसा संवेदनशील राजतंत्र अब तक देखने या सुनने को नहीं मिला है। वह एक ऐसा तंत्र था जो लोकतंत्र से भी बढ़कर था। हांलाकि, राज्य के राजा का चयन सत्ता उत्तराधिकार की अग्रजाधिकार विधि के तहत होता था। यानी राजा का ज्येष्ठ पुत्र सत्ता का उत्तराधिकारी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वर्तमान लोकतांत्रिक पद्धति में सैद्धांतिक रूप से सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होती है लेकिन व्यवहारतः ऐसा नहीं है। पूरा विपक्ष यहां तक कि देश की आधी जनता भी यदि सरकार से इस्तीफा मांगे, तो भी बड़ी साफगोई से इन्कार कर दिया जाता है, और अपने पक्ष में ढेर सारे तर्क गढ़ दिये जाते हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि यदि किसी देश की सत्ता, उस देश की जनता के द्वारा चुनी गई हो, जनता के हित में कार्य करती हो और जनता के लिए समर्पित हो; तो ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक कह सकते हैं (By the people, of the people and for the people.)। यानी उनके कहने का अर्थ यह भी है कि सरकार के निर्माण या चयन में लोकतांत्रिक इकाई के सभी लोगों की समान सहभागिता होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान सत्ता का चाल, चरित्र, चेहरा व मोहरा; जनता व देश के लिए हितकारी है? यदि ऐसा होता तो प्रख्यात गांधीवादी 73 वर्षीय अन्ना हजारे अनशन पर क्यों बैठते? क्या अन्ना का अनशन किसी शौक की अभिव्यक्ति था? दुनिया का कोई भी तंत्र हो, वह लोक की व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित व सुगम बनाने में सहयोग करने के लिए होता है। लोक का कार्य तंत्र पर निगरानी रखते हुए उसको अमर्यादित और भटकाव की दिशा में जाने से रोकना है। तंत्र की लगाम लोक के हाथों में होनी चाहिए। इसके बावजूद दोनों की अपनी-अपनी मर्यादाएं हैं। इस तंत्र को संचालित करने के लिए कुछ परम्पराएं भी स्थापित करनी पड़ती हैं, या निर्मित हो जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-dBlEMW_PRmk/TawJPVSIYsI/AAAAAAAAAm4/8XP_CKyZc28/s1600/Anna%2BHazare.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 234px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-dBlEMW_PRmk/TawJPVSIYsI/AAAAAAAAAm4/8XP_CKyZc28/s320/Anna%2BHazare.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5596858595930563266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तो क्या यह मान लिया जाय की इन परम्पराओं के समक्ष लोक को हमेशा नतमस्तक रहना चाहिए। कुछ राजनेताओं व बुद्धिजीवियों का कहना है अन्ना ने अनशन को हथियार बनाकर सत्ता के साथ ब्लैकमेंलिंग की है। वर्षों से चली आ रही देश की स्थापित संसदीय परम्परा को तोड़ा है। अन्ना के कारण संसदीय तंत्र की संप्रभुता को झटका लगा है। लिहाजा उनका अनशन किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र के हित में नहीं कहा जा सकता। हालांकि ये सब बेकार की बातें हैं। आखिर परम्पराएं क्यों बनायी जाती हैं? परम्पराएं टूटने के लिए भी होती हैं। क्या ये परम्पराएं लोक और लोकहित से भी बड़ी हैं? परम्पराएं लोक के लिए बनायी जाती हैं, परम्पराओं के लिए लोक नहीं बनता। कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां आ जाती हैं कि परम्पराएं जीवित रहती हैं और उन परम्पराओं के कारण ‘लोक’ मरता रहता है। क्या हम लोगों को ‘मरते रहना’ ही पसंद है?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना के अनशन की सफलता का श्रेय पूरी तरह से भ्रष्टाचारी कांग्रेस को है। क्योंकि उसके ‘शूरमाओं’ द्वारा लगातार किये जा रहे बड़े-बड़े घोटालों से जनता बौखला उठी थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में किसी ईमानदार नेतृत्व की तलाश में थी। कहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा चाहिए। अतः जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार के रूप में अन्ना रूपी उस तिनके का सहारा लिया। जनता के समर्थन के कारण यह तिनका सरकार पर भारी पड़ गया। फलतः सरकार को झुकना पड़ा। हालांकि, इस अनशन को केवल इतने से ही सफल नहीं मान लेना चाहिए। अभी तो सरकार और सिविल सोसायटी के बीच क्रिकेट का टी-20 जैसा खेल ही हो रहा था और पूरे 50-50 ओवरों की कई श्रृंखलाएं खेला जाना शेष है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कानून पिछले 43 वर्षों से अधर में लटका हो, या जानबूझकर लटकाया गया हो, के लिए अब तक की सरकारें क्या करती रहीं। क्या इन सरकारों में शामिल कुछ लोगों द्वारा अपनी गर्दन फंस जाने के खतरे से इस कानून के बनने के खिलाफ कई प्रकार के तर्क पेश किये जाते रहे और किये जा रहे हैं? हालांकि, ‘जन-लोकपाल बनाम लोकपाल का संघर्ष’ को कितनी सफलता मिलती है, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यह गंभीर मसला है कि लोकपाल का मसौदा तैयार हो जाने के बाद संसद में पेश किया जाएगा, तो ठीक उसी रूप में पारित हो सकेगा? संसद के दोनों सदनों के 795 सदस्य क्या आंख मूदकर इस विधेयक के पक्ष में हाथ उठा देंगे? एक आंकड़े के मुताबिक, संसद के 35 प्रतिशत सदस्य किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो सबसे बड़ा पहाड़ इन माननीय सदस्यों के ऊपर ही टूट पड़ेगा। इस कारण लोकपाल विधेयक संसद में पारित करा लेना उससे भी ज्यादा कठिन है जितना अन्ना समझते हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-w3se7mDg7_0/TawJB3d_vZI/AAAAAAAAAmw/NudCjVw7BeY/s1600/Lokpal%2BBill.Joint%2BDrafting%2BCommittee.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 295px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-w3se7mDg7_0/TawJB3d_vZI/AAAAAAAAAmw/NudCjVw7BeY/s320/Lokpal%2BBill.Joint%2BDrafting%2BCommittee.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5596858364588965266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इसी कारण अन्ना ने संयुक्त समिति की पहली बैठक के एक दिन बाद लोकपाल विधेयक पर अपने रुख में नरमी का संकेत दिया और कहा कि संसद सर्वोच्च है, यदि वह विधेयक को खारिज कर देती है तो वह इसे स्वीकार करेंगे। अन्ना ने संसद द्वारा लोकपाल विधेयक पारित करने के संबंध में अपनी ओर से निर्धारित 15 अगस्त की समयसीमा पर भी लचीला रुख अपना लिया है। उन्होंने कहा- “अगर मुझे लगेगा कि सरकार सही मार्ग पर आगे बढ़ रही है तो इस विषय पर मैं सहयोग करने को तैयार हूँ।”  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न यह है कि आप अपने ही खिलाफ कितना कठोर कानून बनाएंगे? शायद इसी कारण लोकपाल विधेयक 1968 से अधर में लटका पड़ा है। इस बात पर कोई ईमानदार और निष्कलंक अन्ना क्या कर सकेगा? सिविल सोसायटी के पांच महानुभाव लोग क्या कर सकेंगे? इन सभी वास्तविकताओं को अन्ना बखूबी समझते हैं। इसीलिए अन्ना को अपनी व इस संसदीय प्रणाली की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-1160323592674644699?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/1160323592674644699/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=1160323592674644699&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1160323592674644699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/1160323592674644699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/04/blog-post_18.html' title='लोकपाल बिल बनाम लोक व तंत्र की मर्यादा'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-dBlEMW_PRmk/TawJPVSIYsI/AAAAAAAAAm4/8XP_CKyZc28/s72-c/Anna%2BHazare.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-515881207485758398</id><published>2011-04-09T15:15:00.010+05:30</published><updated>2011-04-09T19:34:20.380+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्ना हजारे का अनशन'/><title type='text'>जंतर मंतर पर शुक्रवार का दृश्य</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नई दिल्ली &lt;/span&gt;के जंतर मंतर पर प्रख्यात समाजसेवी किशन बापट बाबूराव हजारे उपाख्य अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल का शुक्रवार को चौथा दिन था। इस दौरान "वी.एच.वॉयस" न्यूज वेब-पोर्टल की टीम ने कुछ प्रमुख चित्रों को अपने कैमरे में कैद किया है। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-grS6iM0xSmQ/TaAq39MbGaI/AAAAAAAAAmI/jTb8hT0xed8/s1600/Jantar%2BMantar%2B1.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 362px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-grS6iM0xSmQ/TaAq39MbGaI/AAAAAAAAAmI/jTb8hT0xed8/s400/Jantar%2BMantar%2B1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593517878001998242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-AuoDxsJnI0s/TaArIBAF_YI/AAAAAAAAAmY/VosqNzdfCPQ/s1600/Jantar%2BMantar%2B3.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 324px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-AuoDxsJnI0s/TaArIBAF_YI/AAAAAAAAAmY/VosqNzdfCPQ/s400/Jantar%2BMantar%2B3.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593518153901931906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;               (भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशनरत पति-पत्नी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-FcmCCASSuDY/TaArYotDB5I/AAAAAAAAAmo/WMki8rrUKLs/s1600/Jantar%2BMantar%2B5.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 314px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-FcmCCASSuDY/TaArYotDB5I/AAAAAAAAAmo/WMki8rrUKLs/s400/Jantar%2BMantar%2B5.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593518439437371282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-oB09su6uZNE/TaArQGR-nBI/AAAAAAAAAmg/qJ2wPCPLb_Y/s1600/Jantar%2BMantar%2B4.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 272px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-oB09su6uZNE/TaArQGR-nBI/AAAAAAAAAmg/qJ2wPCPLb_Y/s400/Jantar%2BMantar%2B4.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593518292758076434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-Xm3zPy_beUI/TaAq9gqVtII/AAAAAAAAAmQ/-JsSTG5WxPQ/s1600/Jantar%2BMantar%2B2.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 339px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-Xm3zPy_beUI/TaAq9gqVtII/AAAAAAAAAmQ/-JsSTG5WxPQ/s400/Jantar%2BMantar%2B2.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593517973422060674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;(सभी चित्र : अवनीश सिंह, वी.एच. वॉयस)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-515881207485758398?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/515881207485758398/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=515881207485758398&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/515881207485758398'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/515881207485758398'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html' title='जंतर मंतर पर शुक्रवार का दृश्य'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-grS6iM0xSmQ/TaAq39MbGaI/AAAAAAAAAmI/jTb8hT0xed8/s72-c/Jantar%2BMantar%2B1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4135916337936443015</id><published>2011-04-08T20:37:00.006+05:30</published><updated>2011-04-09T13:26:56.525+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'/><title type='text'>अन्ना की मुहिम को आरएसएस का समर्थन</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नई दिल्ली&lt;/span&gt; के जंतर मंतर पर प्रख्यात समाजसेवी किशन बापट बाबूराव हजारे उपाख्य अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल का शुक्रवार को चौथा दिन था। इस दिन अपराह्न 3.30 बजे राष्ट्रीय स्वयंसेवस संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री राम माधव, श्री मधुभाई कुलकर्णी और डॉ. बजरंग लाल गुप्ता भी मंच पर पहुंचे। संघ के इन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का योग गुरु स्वामी रामदेव ने स्वागत किया। इस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अन्ना हजारे की मुहिम को समर्थन का पत्र भी सौंपा गया। श्री राम माधव सहित संघ के सभी पदाधिकारी मंच पर करीब 15-20 मिनट रहे। नीचे प्रस्तुत चित्रों को "वी.एच.वॉयस" न्यूज वेब-पोर्टल की टीम ने अपने कैमरे में कैद किया है। हालांकि अन्ना ने अपना अनशन शनिवार को पूर्वाह्न 10.30 बजे तोड़ दिया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/--F_LFnlCj0g/TaAAssdZ51I/AAAAAAAAAlo/1D07AaSlqCs/s1600/Jantar%2BMantar%2B13.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 249px;" src="http://2.bp.blogspot.com/--F_LFnlCj0g/TaAAssdZ51I/AAAAAAAAAlo/1D07AaSlqCs/s400/Jantar%2BMantar%2B13.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593471505042892626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-C4Y7BAjZ2pw/TaAA05JbJ7I/AAAAAAAAAlw/kpMu4Bg6c-Y/s1600/Jantar%2BMantar%2B12.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 225px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-C4Y7BAjZ2pw/TaAA05JbJ7I/AAAAAAAAAlw/kpMu4Bg6c-Y/s400/Jantar%2BMantar%2B12.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593471645887702962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-5cxx0WcpIJ8/TaAA-XYpZJI/AAAAAAAAAl4/3scsAo0jiGA/s1600/Jantar%2BMantar%2B11.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 260px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-5cxx0WcpIJ8/TaAA-XYpZJI/AAAAAAAAAl4/3scsAo0jiGA/s400/Jantar%2BMantar%2B11.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593471808623436946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपे गए समर्थन का पत्र-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-msV4yIae4lU/TaARDYbcJhI/AAAAAAAAAmA/wDfD4_x_pV0/s1600/RSS%2BLetter.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 287px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-msV4yIae4lU/TaARDYbcJhI/AAAAAAAAAmA/wDfD4_x_pV0/s400/RSS%2BLetter.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593489486988977682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4135916337936443015?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4135916337936443015/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4135916337936443015&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4135916337936443015'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4135916337936443015'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/04/blog-post_08.html' title='अन्ना की मुहिम को आरएसएस का समर्थन'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/--F_LFnlCj0g/TaAAssdZ51I/AAAAAAAAAlo/1D07AaSlqCs/s72-c/Jantar%2BMantar%2B13.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-7994124170893193455</id><published>2011-04-04T13:53:00.012+05:30</published><updated>2011-04-05T16:54:09.767+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेट का भारतीयकरण या भारतीयों का क्रिकेटीकरण?'/><title type='text'>क्रिकेट का भारतीयकरण या भारतीयों का क्रिकेटीकरण?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-MLPDXfLLRt0/TZmAzdqej2I/AAAAAAAAAlA/TPtP6XT7sa0/s1600/MS%2BDhoni%2B2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 248px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-MLPDXfLLRt0/TZmAzdqej2I/AAAAAAAAAlA/TPtP6XT7sa0/s320/MS%2BDhoni%2B2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591642033981656930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt; &lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुम्बई के वानखेड़े स्टेडियम&lt;/span&gt; में 49वें ओवर की दूसरी गेंद पर महेंद्र सिंह धोनी के छक्का मारते ही देश भर में ‘इंडिया-इंडिया’ के नारे गूंजने लगे। चक दे इंडिया। कुछ लोगों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए और कुछ ने ‘वंदेमातरम्’ की धुन भी गुनगुनाईं, और भी कई प्रकार के नारे लगाए जा रहे थे। ‘वंदेमातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे उन लोगों ने भी लगाए जो इसके पहले तक इन नारों को साम्प्रदायिक कहा करते थे। भई लगाएं भी क्यों न; देशभक्ति का भाव जो पैदा हो गया था। भारतीय क्रिकेट टीम ने 28 वर्षों बाद एक बार पुनः विश्वकप जीतकर देश का सिर जो ऊंचा कर दिया था। भारतीय टीम के माथे पर विश्वविजेता का सेहरा जो बंध चुका था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजधानी दिल्ली सहित देश के कई प्रमुख शहरों के मुख्य रास्ते जाम हो गए थे। इस कारण सभी दो पहिया व चार पहिया वाहन, और यहां तक कि पैदल यात्री भी, रेंग-रेंग कर चलने को मजबूर थे। इसके बावजूद जाम में फंसे हर किसी के चेहरे पर जश्न का भाव साफ झलक रहा था। मस्ती में डूबे लोगों को नियंत्रित करने के लिए कई जगहों पर पुलिसिया सख्ती भी करनी पड़ी। लेकिन किसी भी यात्री के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं था। सभी प्रसन्न थे। क्योंकि देशभक्ति का भाव जो हिलोरें ले रहा था। भारतीयता का भाव उफान ले रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेल खत्म होने के बाद मैं भी सहसा सड़क पर निकल पड़ा। सड़क पर जश्न का ऐसा माहौल था कि दीवाली के दिये भी मात खा रहे थे, यानी इस जश्न के खुशनुमा माहौल को यदि महादीवाली की संज्ञा दे दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अभी मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि अचानक पांच-छह हम-उम्र युवा हाथ में तिरंगा लिये हमसे गले मिलने को आतुर दिखे। मैं उनको जानता-पहचानता तक नहीं था, फिर भी वे मुझसे गले मिलने लगे। जीत की इस खुशी के कारण वे अपने आप को रोक नहीं पा रहे थे। भावविह्वल भी हो रहे थे। कुछ की आंखों में आंसू भी मैंने देखे। उनके अंदर जोश, उमंग था और एक अलग प्रकार का जुनून भी दिख रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच में यह क्रिकेट की नहीं बल्कि भारतीय टीम की विजय है। भारतीय खिलाड़ियों की योग्यता, प्रतिभा, श्रम और कौशल की विजय है। यह विजय उनके द्वारा तपस्या सदृश किए गए प्रयास का प्रतिफल है। इस विजय को अंग्रेजी खेल की विजय कहना किसी भी प्रकार से उचित नहीं होगा। सच कहें तो अग्रेजों का दिया क्रिकेट आज के अधिकांश युवाओं में देशभक्ति के प्रकटीकरण का एक साधन बनता हुआ दिखाई दे रहा है। जो कुछ भी है उसका होना सत्य है, और जो कुछ नहीं है उसका न होना ही सत्य है। कभी-कभी जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। हर पीली दिखने वाली वस्तु सोना नहीं होती। वर्तमान में क्रिकेट प्रेमियों का बहुमत है और आप लोकतंत्र में बहुमत को नकार नहीं सकते।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद आप यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि ये सब क्रिकेट का भारतीयकरण है या भारतीयों का क्रिकेटीकरण? ये सच में देशभक्ति है या कुछ और? क्या ये देशभक्ति सचमुच स्थाई है? दरअसल; हर्षातिरेक, हर्षातिशय, हर्षोल्लास, हर्षोत्फुल्ल, हर्षोन्माद, हर्षाश्रु, ये सारी अवस्थाएं क्षणिक होती हैं। इनमें स्थायित्व नहीं होता। खेत को सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता होती है लेकिन बाढ़ के जल से खेत की सिंचाई नहीं हुआ करती। बाढ़ तो सब कुछ बहा ले जाती है। सबको तबाह कर देती है। उसके प्रवाह में रचनात्मकता नहीं होती।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अब तक का सबसे बड़ा घोटाला करके 2जी स्पेक्ट्रम के प्रतीक बन चुके तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा और उनके पूर्व सहयोगियों- शाहिद उस्मान बलवा, सिद्धार्थ बेहुरा, आर.के. चंदोलिया तथा विदेशों में करोड़ों का काला धन जमा करने वाले हसन अली खान भी क्रिकेट देखते हैं। भारत के विजयी होने पर प्रसन्न होते हैं। भावविह्वल और हर्षोन्मत्त हो जाते हैं। क्या इसी को देशभक्ति मान लिया जाए? क्या क्रिकेट देखना भर ही देशभक्ति के लिए पर्याप्त है? क्या देश के विजयी होने के बाद नाच-गाकर खुशियां मनाना ही देशभक्ति का पर्याय है? क्या यही सब देश की समस्याओं के समाधान के लिए उपयुक्त है? &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-0kInHR3UZ2Y/TZmAovNYSkI/AAAAAAAAAk4/NcRJ9jmdRs0/s1600/Manmohan-Gilani%2B2.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 224px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-0kInHR3UZ2Y/TZmAovNYSkI/AAAAAAAAAk4/NcRJ9jmdRs0/s320/Manmohan-Gilani%2B2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591641849712888386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले साफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भारत आये थे तो उनके बारे में यहां के समाचार पत्र, पत्रिकाओं ने लिखा था कि यदि गेट्स के कुछ करोड़ रूपए गिर जाएं तो उनको उठाने की भी फुर्सत नहीं है। क्योंकि जब तक वह उसे उठायेंगे तब तक उस गिरे धन का कई गुना नुकसान हो चुका होगा। दरअसल, बिल गेट्स वहुत व्यस्त आदमी हैं और उनका हर क्षण कीमती है। लेकिन क्या भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बिल गेट्स से भी गये-गुजरे हैं कि उनका समय और पैसा नष्ट नहीं होता? क्या डॉ. सिंह अपने को सामान्य व्यक्ति मानते हैं? लेकिन वह सामान्य कैसे हो सकते हैं? वह तो भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री हैं और उनके ऊपर 121 करोड़ लोगों के नेतृत्व का भार है। इसलिए उनका हर क्षण महत्वपूर्ण है, बिल गेट्स से भी ज्यादा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बिल गेट्स मैच देखते हैं और वह भी पूरे आठ घंटे समय खर्च करके? नहीं, उनके लिए यह संभव ही नहीं है। देश का और अपना किसी भी प्रकार का नुकसान करके क्रिकेट देखना देशभक्ति कैसे कही जा सकती है? भई देखिये, खूब देखिए, आप भी तो आदमी ही हैं। आपके पास भी मन और मस्तिष्क है। आपको भी दिमागी थकान मिटाने की आवश्यकता होती है। लेकिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को बगल में बैठाकर क्या यह संभव है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान के बीच क्रिकेट के साथ-साथ दुनिया की कोई भी कूटनीति सफल नहीं हो सकती। क्योंकि उसका स्वयं पर नियंत्रण ही नहीं है। वह अमेरिका, आर्मी, आतंकवाद, उलेमा और चीन; इन पांच के चंगुल में बुरी तरह से जकड़ा हुआ है। बिना इन पांचों के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, तो फिर कोई यूसुफ रजा गिलानी या आसिफ अली जरदारी वार्ता की मेज पर क्या कर सकेगा? इसलिए उसके साथ क्रिकेट कूटनीति भी एक तरह से समय की बर्बादी ही है। इस संदर्भ में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की बातों में दम है, जो ये बातें दुहराती रही है कि बिना आतंकी ढ़ांचा समाप्त किये पाकिस्तान से कोई वार्ता नहीं होनी चाहिए। समस्या को बिना समझे उसका समाधान नहीं हो सकता। दरअसल, मनमोहन सिंह सब जानते हैं; पर वह तो गिलानी को बुलाकर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यू.पी.ए. सरकार के खिलाफ देश भर में चल रही चर्चा को दूसरी दिशा में मोड़ने का असफल प्रयास भर कर रहे थे। यह अजीब कूटनीतिक प्रयास है जो यही मानकर किया जा रहा था कि इससे हासिल कुछ नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-zH6Zx-OyWjg/TZmAWhBvGsI/AAAAAAAAAkw/fBtSKwuAaWM/s1600/Manmohan-Gilani%2B1.jpeg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-zH6Zx-OyWjg/TZmAWhBvGsI/AAAAAAAAAkw/fBtSKwuAaWM/s320/Manmohan-Gilani%2B1.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591641536668310210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत और किसी अन्य देश के साथ क्रिकेट के समय जैसे सामान्य लोग अपने काम-धंधे की छुट्टी करके पूरे व्यस्त हो जाते हैं, उसी तरह मनमोहन भी पाकिस्तान का बहाना बनाकर पूरे आठ-दस घंटे तक व्यस्त हो गए। यह किसी भी प्रकार से न तो देश-हित में कही जाएगी और न ही देशभक्ति। डॉ. सिंह ने जो किया उनसे प्रेरणा लेकर देश भर के कई अधिकारियों, कर्मचारियों ने भी कार्य से अपने को विरत रखा। इसके अतिरिक्त भी करोड़ों लोगों ने क्रिकेट देखने के लिए अपने को खाली रखा। इससे देश के करोड़ों घंटे का मानव श्रम बर्बाद हुए और होते ही रहते हैं, जिसकी भरपाई फिर कभी भी नहीं की जा सकती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली सरकार के आबकारी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, मोहाली और वानखेड़े में भारतीय टीम की जीत की खुशी में दिल्ली के ‘कथित उत्साही लोगों’ ने 26 करोड़ रुपये से अधिक की शराब पी। इन आंकड़ों में अधिकांश युवा शामिल हैं। ये कैसी देशभक्ति है? कैसा हर्षोदय है? देशभक्ति के प्रकटीकरण का कैसा तरीका है? दरअसल, ये सब बातें हर्ष का क्षणिक उन्माद है, जिसमें तनिक भी स्थायित्व नहीं होती। इससे मिलता कम और नुकसान ज्यादा होता है। तो इस ‘क्रिकेटिया जुनून’ को देशभक्ति कैसे कहा जा सकता है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-7994124170893193455?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/7994124170893193455/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=7994124170893193455&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7994124170893193455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7994124170893193455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='क्रिकेट का भारतीयकरण या भारतीयों का क्रिकेटीकरण?'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-MLPDXfLLRt0/TZmAzdqej2I/AAAAAAAAAlA/TPtP6XT7sa0/s72-c/MS%2BDhoni%2B2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3012423614779083511</id><published>2011-03-17T17:45:00.004+05:30</published><updated>2011-03-17T17:49:55.933+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनमोहन का नेतृत्व और उसके मायने'/><title type='text'>मनमोहन का नेतृत्व और उसके मायने</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुराने जमाने&lt;/span&gt; में किसान जब बैल से खेत की जुताई करता था तो कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां आ जाती थीं कि बैल खेत की एक भी क्यारी जोतने या आगे बढ़ने से ही इन्कार कर देता था। ऐसी परिस्थिति में किसान बैल के हर मर्म को समझता था। वह कोई और उपाय न कर बैल की पूंछ मरोड़ता था और बैल आगे बढ़ने लगता था। ठीक वैसी ही स्थिति कांग्रेस-नीत यू.पी.ए. सरकार की हो गई है, जिसको न्यायालय रूपी किसान को सरकार के कर्तव्यों और यहां तक कि उसके अधिकारों की याद दिलाने के लिए लगातार उसकी पूंछ मरोड़नी पड़ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यायालय मौजूदा दौर में किसान की भूमिका में आ गया है। भ्रष्टाचार के इस माहौल में न्यायालय ही देश की प्राणवायु बना हुआ है। यही नहीं न्यायालय ने सरकार को कई मुद्दों पर फटकार भी लगाई है। शीर्ष न्यायालय ने कालेधन के संदर्भ में एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को यहां तक कहा- “इस देश में हो क्या रहा है?” इसके बाद अब न्यायालय के पास सरकार को कहने के लिए बचता ही क्या है? न्यायालय आखिर अब किन शब्दों में सरकार को फटकार लगाए? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि किसी देश की चुनी हुई सरकार की तुलना जानवर से करना कतई उचित नहीं है। लेकिन वर्तमान यू.पी.ए. सरकार के रवैये के कारण बैल का उदाहरण ही सटीक मालूम पड़ता है। इस संदर्भ में यदि यह कहें कि मौजूदा दौर में न्यायपालिका ही देश की नैतिक सत्ता का संचालन कर रही है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी और जनता द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार अपने कर्तव्यों को भूलकर लगातार बगलें झांक रही है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/--Yi91SqaZ20/TYH7mjGjmBI/AAAAAAAAAkg/RDey97k41qk/s1600/Sonia-Manmohan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 204px;" src="http://1.bp.blogspot.com/--Yi91SqaZ20/TYH7mjGjmBI/AAAAAAAAAkg/RDey97k41qk/s320/Sonia-Manmohan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5585021652592465938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की यह ऐसी पहली सरकार है जिसको शीर्ष न्यायालय ने सबसे अधिक बार फटकार लगाई है और जिसके मुखिया को अपनी गलती स्वीकारते हुए सबसे अधिक बार शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। लेकिन केवल गलती स्वीकार लेना ही पर्याप्त है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सरकार ने भ्रष्टाचार के अपने सारे कीर्तिमान स्वयं ही ध्वस्त कर दिए हैं। भष्टाचार के मसले पर बेशर्मी की भी हद है! इस कारण यह सरकार जनता के चित्त से उतर गई है। जनता इस सरकार को धूल चटाने के इंतजार में मौन बैठी है। बस आम चुनाव भर की देर है। यदि चुनाव हुआ तो फिर किसी यू.पी.ए.-2 का यू.पी.ए.-3 के रूप में प्रकट होकर सत्तासीन हो जाना संभव नहीं दिखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यू.पी.ए.-2 के रूप में केंद्र की यह ऐसी पहली सरकार है जो भ्रष्टाचार के कारण एक दिन भी ठीक से चैन की नींद नहीं ले पा रही है। एक घोटाले की पोल खुलती है और उस पर जांच की प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई कि तब तक दूसरे घोटाले का धुआं उड़ने लगता है। पाकिस्तान में जैसे हर रोज कहीं न कहीं आतंकी धमाके होते हैं, ठीक उसी तरह भारत में घोटालों का होना आम बात हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श हाउसिंग घोटाला, सीवीसी की नियुक्ति में हेराफेरी, एस-बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला, ये तमाम घोटाले इस सरकार की उपलब्धियों में शुमार हैं। इसके अलावा कई घोटाले ऐसे हैं जिनका पोल खुलना अभी शेष है। वैसे, घोटाले की इस रफ्तार को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2014 में सरकार के कार्यकाल पूरा करने तक सैंकड़ों और घोटालों का वारा-न्यारा कर दिया जाएगा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी सीवीसी पर नियुक्ति का विवादित मसला समाप्त नहीं हुआ कि विकीलीक्स के खुलासे से सरकार की सांसें अटक गई हैं। इस खुलासे में कहा गया है कि 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर वामपंथियों के समर्थन वापसी के बाद जब मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यू.पी.ए.-1 की सरकार अल्पमत में आ गई थी, तो सरकार को बचाए रखने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई थी। हालांकि सरकार ने इस खरीद-फरोख्त की जांच के लिए कुछ सांसदों की एक समिति भी बनाई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट का भी वही हश्र हुआ जो सबका होता है, या होता रहा है। उससे कुछ स्पष्ट बातें निकल कर सामने नहीं आ सकीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात- ‘मिस्टर क्लीन’ मनमोहन सिंह ने जिस यू.पी.ए.-1 की सरकार का नेतृत्व किया था, वह भी मौजूदा यू.पी.ए.-2 की ही तरह भ्रष्ट थी। बार-बार इस बात की चर्चा होती है कि मनमोहन सिंह बहुत शालीन, ईमानदार, विद्वान, गंभीर और स्वच्छ छवि के हैं। वास्तव में यदि डॉ. सिंह के अंदर इतने सारे गुण हैं तो उनकी सरकार अब तक की सबसे भ्रष्टतम सरकार कैसे साबित हो रही है। यदि यह सरकार भ्रष्टतम है तो फिर उनको स्वच्छ छवि का कैसे कहा जा सकता है? उनके अंदर चाहे जितने भी गुण हों; मगर यदि यह सरकार उनके नेतृत्व में नैतिकता के धरातल से लगातार दूर जा रही है तो इसके दोषी प्रत्यक्ष रूप से डॉ. सिंह ही कहे जाएंगे। इसके लिए सोनिया गांधी कैसे जिम्मेदार कही जा सकती हैं, चाहे भले अंदर की बात कुछ और ही क्यों न हो ? आखिर सत्ता का प्रत्यक्ष संचालन तो मनमोहन ही कर रहे हैं, फिर सोनिया कैसे जिम्मेदार हैं? इसका सारा दोष डॉ. सिंह का है, जो सोनिया के प्यादे की तरह कार्य कर रहे हैं। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-xbzvOLQPlM8/TYH71meF32I/AAAAAAAAAko/GpHCzAJo6Sg/s1600/Manmohan-Sonia%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-xbzvOLQPlM8/TYH71meF32I/AAAAAAAAAko/GpHCzAJo6Sg/s320/Manmohan-Sonia%2B1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5585021911194525538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनमोहन सिंह इस देश के बड़े अर्थशास्त्री हैं। ज्ञान, प्रतिभा, कॉलेज की डिग्री, और विद्वता की दृष्टि से भी देश में उनके जैसा कोई अर्थशास्त्री नहीं है। लेकिन यह विद्वता किस काम की, जो केवल कहने के लिए है और जिसका व्यावहारिक धरातल पर प्रभाव शून्य से भी नीचे हो। वैसे डॉ. सिंह जब स्वर्गीय नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में वित्त मंत्री थे, उस दौरान भी उनकी प्रतिभा अपना प्रभाव नहीं छोड़ पा रही थी। उनके वित्त मंत्री रहते हुए महंगाई तब तक के सभी सरकारों के सारे रिकॉर्ड्स ध्वस्त कर चुकी थी। इस संदर्भ में यह भी कहा जाता है कि डॉ. सिंह को विश्व बैंक के दबाव में देश का वित्त मंत्री बनाया गया था। हालांकि इन बातों में कितनी सत्यता है, ये गंभीर जांच के विषय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हर मोर्चे पर यदि मनमोहन सिंह विफल साबित हो रहे हैं तो यह किसका दोष है। माना कि वह राजनेता नहीं हैं; इसलिए राजनीति के दांव-पेंच नहीं समझते और अपने सहयोगियों के बहकावे में आकर गलत निर्णय कर बैठते हैं। लेकिन क्या यह भी मान लिया जाए कि वह प्रकाण्ड अर्थशास्त्री नहीं हैं? यह मानना तो संभव ही नहीं है, क्योंकि उनका अर्थशास्त्री होना ही सत्य है, तो फिर महंगाई अपने चरम पर कैसे पहुंच गई? यही नहीं लगातार बढ़ती भी जा रही है; यानी डॉ. सिंह को जिन विषयों की जानकारी है उसमें भी लगातार मात खाते जा रहे हैं। इन बातों से यही कहा जा सकता है कि डॉ. सिंह के पास अर्थशास्त्र के साथ-साथ अन्य किसी भी विषय का व्यावहारिक ज्ञान नहीं है, केवल किताबी ज्ञान ही समेटे हुए हैं। अर्थात- महंगाई के साथ ही उन सभी मुद्दों पर डॉ. सिंह ‘आर्थिक अखाड़े के किताबी पहलवान’ ही साबित हो रहे हैं; और आप इसका अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं कि किताबी पहलवान की वास्तविक अखाड़े में कितनी दुर्दशा हो सकती है; और होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3012423614779083511?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3012423614779083511/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3012423614779083511&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3012423614779083511'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3012423614779083511'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/03/blog-post_17.html' title='मनमोहन का नेतृत्व और उसके मायने'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/--Yi91SqaZ20/TYH7mjGjmBI/AAAAAAAAAkg/RDey97k41qk/s72-c/Sonia-Manmohan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-7336695454667598082</id><published>2011-03-03T15:56:00.001+05:30</published><updated>2011-03-03T15:57:44.813+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ'/><title type='text'>कश्मीर मसले पर पूरा देश एकजुट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-ZpYnTtwlo5k/TW9s-BSyCeI/AAAAAAAAAkY/s7l6EtJgBzg/s1600/Dr%2BMohanrao%2BBhagwat.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 303px; height: 279px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZpYnTtwlo5k/TW9s-BSyCeI/AAAAAAAAAkY/s7l6EtJgBzg/s320/Dr%2BMohanrao%2BBhagwat.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579798276090235362" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कश्मीर की समस्या&lt;/span&gt; सारे भारत की समस्या है। इसका समाधान जिसको करना चाहिए वे किसी भी कारण इस कार्य में यदि यशस्वी नहीं हो रहे, तो ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे या तो उनके इरादे ही गलत हैं या फिर व इस समस्या को हल करना ही नहीं चाहते। बात स्पष्ट है कि इसके समाधान के लिए प्रजातंत्र की वास्तविक सत्ता यानी जनता को जागृत करना पड़ेगा। सारा भारत आंदोलन के रूप में कब और कैसे खड़ा होगा, यह तय करने व सोचने की बात है। लेकिन अन्ततः यही करना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संघ के स्वयंसेवक देश भर में कश्मीर विषय को लेकर प्रत्येक घरों में सम्पर्क कर रहे हैं। इस सम्पर्क में कश्मीर के संदर्भ में वर्तमान की स्थिति क्या है, क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए, आदि बिंदुओं को लेकर सम्पर्क किया जा रहा है। क्योंकि सबसे पहली बात यह है कि कश्मीर के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहे हैं, उन षड्यंत्रों से आमजन को विदित कराना आवश्यक है। भारत के आम आदमी को कश्मीर की वास्तविक स्थिति को समझना पड़ेगा। संघ ने इसके लिए सतत कार्य किया है और आगे भी करता रहेगा। इसके समाधान का रास्ता किन जंजालों से हमें निकालना पड़ेगा, इसके बारे में विचार करने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भारत का कोई भी व्यक्ति कश्मीर का देश से कटना बर्दाश्त नहीं करेगा। परिस्थितियां बहुत कठिन हैं। षड्यंत्र चारों ओर से चल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय शक्तियां के साथ ही ‘राष्ट्रीय’ व राष्ट्रविरोधी शक्तियां भी इस कार्य़ में लगी हुई हैं। दुर्भाग्य यह कहा जाए कि अपनी सत्ता भी इसी षड्यंत्र में लगी है कि जैसे-तैसे शांति हो जाए, शांति यानी देश की शांति नहीं बल्कि हमारे दिमाग को शांति मिल जाए। अगले चुनाव के लिए वोट का इंतजाम हो जाए। समझौते के कारण ही समस्या बिगड़ी है। हम सबको इसके खिलाफ लड़ना है। गलती में एक विभाजन हो गया, तो इसका एकमेव कारण है यही है कि उस समय हम लोग ताकतवर नहीं थे। जिनके पास ताकत थी उन्होंने जनता को इसके लिए कहा नहीं कि इन षड्यंत्रों का विरोध करो। जो भी उसके गुण-दोष हैं, समीक्षा है, उसको करने वाले करें, जैसा सोचना है हम सोचें, लेकिन हमको फिर से भारत को टूटते नहीं देखना है, यह बात पक्की है। इसी बात को लेकर हम आगे बढ़ेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात है कि संघ सेकुलर न बने। ये तो हो ही नहीं सकता। अगर मैं भी संघ को सेकुलर बनाना चाहूं, तो नहीं सकता। जो संघ के स्वयंसेवक हैं वो इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। जो संघ में गए नहीं उनको शायद ये बात न समझ में आए। डॉ. हेडगेवार ने जो बताया वैसे ही संघ चलेगा, इस संदर्भ में वे इतनी पक्की दिशा देकर चले गए हैं। इसलिए संघ का रुख मोड़ना संघ के सरसंघचालक या किसी भी अखिल भारतीय अधिकारी के बस की बात नहीं है। संघ जिस ध्येय को लेकर चला है वही करने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रवादी मुस्लिम वगैरह का जो काम चलता है, वह मुसलमानों के द्वारा मुसलमानों के लिए चलाया गया कार्य़ है। लेकिन वे लोग जैसा कहते हैं, वैसा हुआ तो सबका लाभ होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए दो-तीन कार्यकर्ताओं को इसके लिए कहा है कि उनकी चिंता करें। राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच से संघ का संबंध नहीं है। संघ का सिस्टर आर्गनाइजेशन भी कोई नहीं है। संघ की केवल शाखा है। संघ के केवल स्वयंसेवक हैं। संघ के स्वयंसेवक राजनीतिक दल सहित अनेक संगठन चलाते हैं। लेकिन वहां केवल स्वयंसेवक ही नहीं हैं और भी लोग कार्य करते हैं। उनको स्वयं को चलाने की जिम्मेदारी खुद वहन करनी होती है। हां, यदि उनको अच्छा चलने में सहायता चाहिए, तो हम देते हैं। जो बातें वास्तविक हैं वहीं मैं बता रहा हूं। यह कोई डिप्लोमेटिक उत्तर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर को लेकर जिन लोगों ने गलतियां की, उसको हम सुधार लेंगे। लेकिन यह बात पक्की है कि इसके समाधान के लिए हमें जो करना है, बिना गलती से करना है। और बिना गलती के करने के लिए कुछ बातें ध्यान में रखनी है। ये बातें ध्यान में न रखने के कारण ही ये प्रसंग आया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्रता के इतने वर्षों पश्चात भी हमको यहां बैठकर कश्मीर का विचार करना पड़ता है। पहली बात है कि भारत एकात्म अखंड है, हिंदू राष्ट्र है, इसमें कोई समझौता नहीं, क्योंकि यह सत्य है। इससे समझौता करने वाले आगे ठोकरें खाएंगे और सबके लिए संकट आएगा। अन्यान्य शब्दों में दुनिया के सभी लोग ऐसा मानते हैं, कुछ लोग अपनी इच्छा से मानते हैं और कुछ लोग गफलत में कभी-कभी मान लेते हैं। यह सत्य है, तो सत्य से विमुख होना किसी के लिए फायदे की बात नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज अपना जितना बस चलता है उतना बोलना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद जो भारत बना, कश्मीर का जो एक्सेशन और मर्जर हुआ, वह एक तथ्य है। पूरे कश्मीर को भारत में लाने के लिए के संदर्भ में संसद ने जो प्रस्ताव पारित किया है वह ठीक है। वहां बसने वाले सात लाख तथाकथित पाकिस्तान से आए हिंदू इस नए भारत के नागरिक बनकर पूर्ण सत्ता के साथ मिलकर कैसे रहें और जो चार लाख कश्मीरी विस्थापित हिंदू जो अपने जन्मभूमि से बिछड़े हैं, वो फिर से वहां अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ कैसे रह सकें, इसी दिशा में सारी बातें करनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर के संबंध में जो कुछ भी बोलना या करना हो उसका लक्ष्य वही होना चाहिए। यदि रणनीति के नाम पर कुछ करना भी है तो यह भी तय करना चाहिए कि इधर-उधर जाकर वापस हम उसी रास्ते पर आएंगे। ऐसी कोई भी रणनीति जो हमें अलग मुकाम पर पहुंचाती है, हमें पसंद नहीं है। कश्मीर की ऑटोनामी आजादी के बाद भी हमको सिरे से खारिज करना है। वहां जो भारत भक्त हैं उनकी शक्ति बढ़े, इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए। अलगाववादी कितना भी दावा करें लेकिन इस पर ध्यान न देते हुए हमको बात करनी है जम्मू और लद्दाख की, कश्मीरी विस्थापितों की, सात लाख पाकिस्तान से आए हिंदुओं की, कश्मीर घाटी में 33 हजार सिख भी हैं; उनकी। वहां और भी लोग हैं जो भारत परस्त हैं। यह सरकार इनके हित में कदम नहीं उठा रही है, सोच समझ कर उल्टा कर रही है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आप और हम जो बातें जानते हैं वो सर्व-समर्थ सत्ता के लोग नहीं जानते यह तो हो ही नहीं सकता। इन सभी समस्याओं का एक ही हल है कि भारत की जनता का पूर्ण दबाव इस मुद्दे पर खड़ा हो, तो ये बातें बदलेंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात है कि कश्मीर समस्या का हल भारत के हित में करना है। अब तो अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी खुल कर आ गई हैं। पहले भी थे, लेकिन अब खुलकर सामने आ गए हैं। अन्य जगहों से उनके पैर उखड़ गए, हो सकता है कि इनमें से किसी के साथ अपने संबंध दोस्ती के हों, कोई पड़ोसी मुंह से दोस्ती करता है चीन जैसा और अंदर ही अंदर पीठ में छूरा भोंकता है। अमेरिका जैसे भी दोस्त हैं, लेकिन इन दोस्तों के लिए हमको ठीक नहीं करना है, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे अमेरिका या चीन अपने मामलों में किसी अन्य देश को सहन नहीं करते, वैसा ही हमको भी करना चाहिए। अब हमारी ताकत भी कम नहीं है। जितनी हमको इन लोगों की जरूरत है उससे ज्यादा इन लोगों को हमारी जरूरत है। आज वार्ताकार जो कर रहे हैं, सत्ताधारी पार्टियों के लोग समझते नहीं हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक बात हम लोगों को करनी चाहिए, दिल्ली में हम लोग रहते हैं योजना बनाकर अच्छी तरह से कर सकते हैं। जितने सांसद हैं उन सबके सामने यहां की जानकारी के आधार पर कश्मीर की वास्तविक स्थिति को रखा जाए, पार्टी की न सोचें, हमारे विरोध में चलने वाली पार्टी भी हो सकती है, लेकिन व्यक्ति को सोचें। विरोधी पार्टियों के सांसदों से भी हम मिलें। कम से कम इतना तो होगा कि देश विरोधी काम करने में उनकी जो ताकत लगती है वो कम हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरी बात यह है कि जनजागरण के ज्यादा और अच्छे कार्यक्रम हों। इसके लिए हम सबको प्रयास करना पड़ेगा। अभी जनसम्पर्क अभियान में हमने संघ के खिलाफ कथित दुष्प्रचार मामले के साथ ही राममंदिर निर्माण और कश्मीर के मुद्दे को भी शामिल किया था। यदि ऐसा हम सफलतापूर्वक कर ले गए तो कश्मीर के खिलाफ बोलने वाला या कश्मीर को देने की बात करने वाला कम से कम 50 वर्षों तक जनता के मन से उतर जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय जनता इस बात पर एकमत है कि कश्मीर जाएगा नहीं, जितना गया उतना ही गया। जन दबाव बनेगा तो विरोधियों की गति भी धीमी पड़ जाएगी। जनजागरण के लिए चार या पांच पृष्ठों की छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से जिसमें कश्मीर मामले का वास्तविक विवरण हो, को लेकर हमको सम्पर्क करना चाहिए। इसके लिए किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। यह चरण प्रारम्भ कर दें, बाकी हम सोचते हैं। सोचते माने सोचेंगे नहीं, बल्कि एकदम सोचेंगे ही। इसके लिए हमको करना है, यह बात पक्की है। मैं विश्वास दिलाता हूं कि यदि हम लोग पूरे मन से इस दिशा में लगे तो यह समस्या अगले दस वर्षों में समाप्त हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(प्रस्तुत आलेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत द्वारा “जम्मू-कश्मीर : वर्तमान परिदृश्य” विषयक परिचर्चा में दिए गए उद्बोधन का संपादित अंश है। परिचर्चा का आयोजन ‘जम्मू-कश्मीर पीपल्स फोरम’ के तत्वावधान में 27 फरवरी 2011 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान में किया गया था।)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-7336695454667598082?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/7336695454667598082/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=7336695454667598082&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7336695454667598082'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/7336695454667598082'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='कश्मीर मसले पर पूरा देश एकजुट'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-ZpYnTtwlo5k/TW9s-BSyCeI/AAAAAAAAAkY/s7l6EtJgBzg/s72-c/Dr%2BMohanrao%2BBhagwat.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-2329559476969788441</id><published>2011-02-25T19:58:00.003+05:30</published><updated>2011-02-26T18:57:32.337+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुटिल कणिक की राह पर दिग्विजय सिंह'/><title type='text'>कुटिल 'कणिक' की राह पर दिग्विजय सिंह</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महाभारत-कालीन&lt;/span&gt; हस्तिनापुर में महाराज धृतराष्ट्र का एक सचिव था, जिसका नाम था कणिक। उसकी विशेषता यह थी कि वह कुटिल नीतियों का जानकार था और धृतराष्ट्र को पांचों पांडवों के विनाश के लिए नित नए-नए तरकीब सुझाया करता था। महाराज ने उसे इसीलिए नियुक्त भी कर रखा था। इसके सिवाय उसकी और कोई विशेषता नहीं थी, जो राज-काज के संचालन में धृतराष्ट्र के लिए उपयोगी हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराज ने उसका वेतन और भत्ता भी ज्यादा तय कर रखा था। इसके अलावा उसकी सारी सुविधाएं उसके समकक्ष सभी राज-कर्मचारियों से ज्यादा थी। धृतराष्ट्र ने उसको हर प्रकार से छूट दे रखी थी। यानी उसके केवल सात खून ही नहीं; बल्कि सारे खून माफ थे। वह जो कुछ भी करता, धृतराष्ट्र उसकी खूब तारीफ करते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ततः उसको मिली सारी विशेष सुविधाएं व्यर्थ ही साबित हुईं। क्योंकि उसकी एक भी तरकीब पांडवों के विनाश के लिए काम न आ सकी। यह भी कहा जाता है कि कणिक ने ही पाण्डवों को मारने के लिए वारणावत नगर में लाक्षागृह के निर्माण का सुझाव दिया था। जब उसके इस सुझाव का पता दुर्बुद्धि दुर्योधन, कर्ण और दुःशासन; आदि को लगा, तो उन लोगों ने इस सुझाव को जल्द ही अमल में लाने के लिए मामा शकुनि के माध्यम से धृतराष्ट्र को मनाने के प्रयास शुरु कर दिए थे। हालांकि उस धधकते लाक्षागृह से माता कुंती सहित पांचों पाण्डव सकुशल निकलने में सफल हुए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर! जो हुआ सो हुआ। अन्ततः पाण्डवों को मारने की सारी तरकीब असफल साबित हुई। इसके बाद क्या हुआ यह सभी जानते ही हैं। महाभारत युद्ध में कौरवों का विनाश हो गया। यानी धर्म व सुव्यवस्था की विजय हुई और अधर्म व कुव्यवस्था का नाश हुआ। अर्थात- दूसरों का अहित चाहने वालों का विनाश हुआ। यही है महाभारत की कथा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वारणावत नगर का लाक्षागृह कांड कुरु कुटुम्ब का वह जीता-जागता षड्यंत्र था जो अनेक क्रूरतम राज-षड्यंत्रों की सारी सीमाएं पार कर चुका था। वह कोई सामान्य घटना नहीं थी। मानवीयता की भी सारी सीमाएं पार कर देने वाली घटना थी। यह सारा षड्यंत्र हस्तिनापुर की सत्ता को दीर्घकाल तक हथियाए रखने के लिए चलाया जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि वर्तमान भारतीय संदर्भ में कणिक की चर्चा करने का मेरा औचित्य केवल कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की तुलना करना भर ही है। इसके लिए मेरे पास कणिक के सिवाय और कोई उदाहरण नहीं है जो दिग्विजय सिंह पर सटीक बैठे। कणिक और दिग्विजय में कई मामलों में काफी समानता है। उनकी हर गलत बयानी को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी माफ कर देती हैं। उनको कुछ भी बोलने की पूरी छूट है। वह सबसे ऊपर हैं। कांग्रेस में सोनिया-राहुल को छोड़कर एक वही ऐसी शख्सियत हैं जिन पर पार्टी अनुसाशन का डंडा काम नहीं करता। पार्टी में उनके खिलाफ कोई शख्स बोलने की हिमाकत भी नहीं कर सकता। क्योंकि वह पार्टी सुप्रीमो के काफी खासम खास हैं। अतः उनके खिलाफ बोलकर कोई अपने कमीज की बखिया क्यों उधड़वाए ?&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-46OuhL98ORE/TWe9LfWXSoI/AAAAAAAAAkQ/5gziesIQUc8/s1600/Digvijay-Singh.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 219px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-46OuhL98ORE/TWe9LfWXSoI/AAAAAAAAAkQ/5gziesIQUc8/s320/Digvijay-Singh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5577634668613159554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस देश में जितने भी विवादित विषय हैं, उन सभी विषयों पर दिग्विजय अपने ‘कणिकवत कुटिल विचार’ प्रकट कर चुके हैं। इसके अलावा भी वह नित नए-नए विवादित विषयों की खोज-बीन में लगे रहते हैं। और उन विषयों पर बोल-बोलकर अपनी भद्द पिटवाते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के अरुणाचल पूर्वी संसदीय सीट से कांग्रेसी सांसद निनोंग एरिंग ने योग गुरु स्वामी रामदेव को ब्लडी इंडियन तक कह डाला था। योग गुरु की गलती मात्र यही थी कि वह राज्य के पासीघाट में आयोजित योग शिविर में जुटे प्रशिक्षणार्थियों को भ्रष्टाचारी कांग्रेस के काले कारनामे का बड़े ही मनोहारी ढंग से वर्णन कर रहे थे। ठीक उसी वक्त सांसद महोदय आ धमके और उन्होंने योग गुरु के साथ जमकर गाली-गलौज की। स्वामी रामदेव के सहायक ने बताया- सांसद ने असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करते हुए बाबा से कहा कि वह राज्य में चला रही भ्रष्टाचार विरोधी अपनी मुहिम बंद कर दें, वरना नतीजा अच्छा नहीं होगा। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि कांग्रेस आलाकमान ने उस सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई तक करना उचित नहीं समझा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विवादित विषय हो तो भला दिग्विजय सिंह कैसे चुप रहें। अतः उन्होंने इस विवाद की बहती नदी में हाथ धोना शुरु कर दिया। उन्होंने योग गुरु से सवाल किया कि भ्रष्टाचार की बातें करने वाले रामदेव को अपनी सम्पत्ति का हिसाब देना चाहिए। ध्यातव्य है कि स्वामी रामदेव पिछले कई महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में जनजागरण अभियान चला रहे हैं। अपने इसी अभियान के तहत योग गुरु अरुणाचल में थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिग्विजय के रवैये से ऐसा लगता है कि उन्होंने हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों, साधु-संतों और देशभक्तों को बदनाम करने का ठेका ले रखा है। यहां तक कि वे दिल्ली के बाटला हाउस मुठभेड़ में आतंकियों की गोली से शहीद मोहन चन्द शर्मा जैसे बहादुर सिपाही की शहादत पर भी प्रश्चचिन्ह उठाने से बाज नहीं आए। वह आजमगढ़ जिले के संजरपुर में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त लोगों के घर जा कर उन्हें प्रोत्साहित करने से भी नहीं चूके। यही नहीं उन्होंने 26/11 मुम्बई हमलों में शहीद महाराष्ट्र के तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत पर भी प्रश्नचिन्ह उठाने की कोशिश की थी। लेकिन स्वर्गीय करकरे की विधवा श्रीमती कविता करकरे ने दिग्विजय की जमकर खिंचाई की थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे दिग्विजय के संदर्भ में इस बात की भी खूब चर्चा चलती है कि मुस्लिम मतों को बटोरने के लिए सोनिया गांधी ने उनको मुक्त-हस्त कर दिया है। दिग्विजय भी सोनिया के इस सम्मान का बदला अपने क्षत्रिय मर्यादा की कीमत पर चुकाने के लिए आमादा दिखते हैं। यहां तक कि वह अपनी सारी लोकतांत्रिक मान-मर्यादाएं भी भूल चुके हैं। जो मन में आया वही आंख मूँदकर बोल देते हैं। मीडिया भी उनके बयान को खूब तरजीह देता है। यदि उनका यही रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनता उनको एक स्वर से मानसिक दिवालिया घोषित कर देगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-2329559476969788441?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/2329559476969788441/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=2329559476969788441&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2329559476969788441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2329559476969788441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/02/blog-post_25.html' title='कुटिल &apos;कणिक&apos; की राह पर दिग्विजय सिंह'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-46OuhL98ORE/TWe9LfWXSoI/AAAAAAAAAkQ/5gziesIQUc8/s72-c/Digvijay-Singh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-4851878989320115499</id><published>2011-02-16T19:06:00.003+05:30</published><updated>2011-02-16T19:15:07.176+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विनायक सेन के बहाने......'/><title type='text'>विनायक सेन के बहाने......</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो आमतौर पर सरदारों के बारे में दुनिया के लोग हास्य व चुटकुले बनाते व सुनाते रहते हैं, लेकिन इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि देश का कोई माना जाना सरदार हास्य व चुटकुले लिखे और वह भी कम्युनिस्टों पर। प्रख्यात स्तंभकार 96 वर्षीय सरदार खुशवंत सिंह का कम्युनिस्टों के संदर्भ में बिल्लियों के नवजात बच्चों वाला एक हास्य बहुत प्रसिद्ध है- &lt;br /&gt;प्राइमरी में पढ़ने वाली एक छात्रा ने अपने प्रधानाध्यापक से कहा- सर! मेरी बिल्ली ने कल रात में दो बच्चों को जन्म दिया है। दोनों कम्युनिस्ट हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रा के मुख से कम्युनिस्ट शब्द सुनकर प्रधानाध्यापक आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि यह घटना वास्तव में एक आश्चर्य है। उन्होंने इस बात की सूचना स्कूल निरीक्षक को लिख भेजी। यह जानकर निरीक्षक भी आश्चर्य में पड़ गए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;निरीक्षक ने 16-17 दिन बाद स्कूल में आकर उस छात्रा से मिलने की इच्छा व्यक्त की। प्रधानाध्यापक ने उस बच्ची को बुलाया और निरीक्षक के सामने कहा कि तुम्हारी बिल्ली के दोनों कम्युनिस्ट बच्चों को निरीक्षक साहब देखना चाहते हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;छात्रा ने तपाक से कहा- सर! अब वो कम्युनिस्ट नहीं रहे, अब तो वे दोनों डेमोक्रेट हो गए हैं। &lt;br /&gt;प्रधानाध्यापक ने छात्रा से पूछा- तुम्हारे कहने का क्या मतलब है। अभी कुछ दिन पहले तुम कह रही थी कि वे दोनों बच्चे कम्युनिस्ट हैं। लेकिन आज कह रही हो कि वे दोनों डेमोक्रेट हो गए हैं। आखिर इसका क्या अर्थ है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रा ने कहा- अजीब सी बात है, यह कोई इतना कठिन थोड़े ही है, जो आसानी से समझ में न आ सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छात्रा ने कहा- सर! बिल्ली के दोनों बच्चियों को जन्म लिए 16-17 दिन हो गए, अब उन दोनों की आंखें खुल गई हैं। इसलिए अब वे दोनों कम्युनिस्ट नहीं रहे, वे डेमोक्रेट हो गए हैं। छात्रा का उत्तर सुनकर दोनों अवाक् रह गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर! यह तो हास्य है; पर जैविक नियमों के अनुसार सत्य भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह यदि देखा जाए तो साम्यवादियों व नक्सलियों के समर्थक भी बिल्ली के इन्हीं नवजात बच्चों की तरह ही प्रतीत हो रहे हैं। क्योंकि नक्सलियों द्वारा किए गए सैंकड़ों मासूमों और बेकसूरों के नरसंहार के बाद भी इन समर्थक महानुभावों की आंखे अभी तक नहीं खुल सकी हैं। इस कारण वे अभी तक डेमोक्रेट यानी लोकतांत्रिक नहीं हो सके। हो सकता है कि कुछ दिन बाद इनकी आंखे खुल जाएं, लेकिन नक्सलियों के हिंसात्मक व अलोकतांत्रिक क्रांति के रास्ते को मनगढ़ंत तर्कों के आधार पर सही ठहराने की इनकी प्रवृत्ति से ऐसा संभव नहीं दिखता। ये लोग किसी भी कीमत पर अपनी आंखें खोलने को तैयार नहीं हैं। आंखें खुल जाने से इन्हें दर्द शुरू हो जाता है। ये सत्य देखना ही नहीं चाहते। इन समर्थक बुद्धिजीवियों और वक्तव्यवीरों को देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बोलते रहने में ही आनंद की अनुभूति होती है। हालांकि इनकी संख्या देश भर में चार अंकों से ज्यादा नहीं है, फिर भी इतना ऊधम मचाए हुए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद के प्रबल समर्थक डॉ. विनायक सेन पर मुझे आश्चर्य होता है। वे जिस अलोकतांत्रिक व अमानवीय पथ को एक वैचारिक रास्ता कहते हैं, उस रास्ते पर चलने के कारण हुई सजा को वे स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं हैं। वह वर्तमान में देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-8di4LF0CRIQ/TVvTbwDlWqI/AAAAAAAAAjs/ekwQykd-qwI/s1600/Bilaspur%2BHC%2B1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 160px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-8di4LF0CRIQ/TVvTbwDlWqI/AAAAAAAAAjs/ekwQykd-qwI/s320/Bilaspur%2BHC%2B1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5574281437510982306" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;24 दिसम्बर 2010 को रायपुर की जिला अदालत ने डॉ. सेन सहित तीन लोगों को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, शेष दो लोगों में माओवादी चिंतक नारायण सान्याल और कोलकाता के व्यवसायी पीयूष गुहा शामिल हैं। डॉ. सेन को मई 2007 में बिलासपुर से गिरफ्तार किया गया था। वर्ष 2009 में उच्चतम न्यायालय ने स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया। लेकिन रायपुर अदालत के 24 दिसम्बर 2010 के फैसले के बाद डॉ. सेन को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. सेन पेशे से चिकित्सक एवं गैर-सरकारी संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनको लोग मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता के तौर पर जानते हैं। उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र की एमबीबीएस और एमडी; जैसी उच्चस्तर की डिग्री ले रखी है और दो वर्ष तक दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अध्यापन कार्य भी किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निचली अदालत ने उनको देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, लोगों को भ़डकाने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए शहरों में नेटवर्क ख़डा करने का दोषी माना था। इसके अलावा उन पर बिलासपुर जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्‍याल की चिट्ठियां अन्‍य माओवादियों तक पहुंचाने का भी दोषी ठहराया गया है। वहीं पीयूष गुहा पर भी सान्याल का संदेश चोरी-छिपे माओवादियों तक पहुंचाने के आरोप लगे थे। गुहा की गिरफ्तारी के दौरान उनके घर से नक्सल आंदोलन से संबंधित काफी दस्तावेज और पत्रिकाएं मिली थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फैसले के निलंबन और ज़मानत के लिए डॉ. सेन व गुहा ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील की थी। उन्होंने न्यायालय में देश के जाने-माने अधिवक्ता राम जेठमलानी को जिरह के लिए खड़ा किया, लेकिन जमानत दूर की कौड़ी ही साबित हुई। इस अपील को 10 फरवरी को हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। यानी उनका अपराध जमानत पर भारी पड़ गया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हाईकोर्ट में छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त महाधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने राज्य शासन का पक्ष रखा। उन्होंने सेन और गुहा को जमानत दिए जाने का विरोध किया था। वहीं, राजनंदगांव में नक्सली हमले में मारे गए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वी.के. चौबे की विधवा रंजना चौबे ने भी सेन की जमानत अर्जी के खिलाफ हस्तक्षेप याचिका लगाई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद के समर्थक बुद्धिजीवियों और वक्तव्यवीरों को अदालत का यह फैसला रास नहीं आ रहा है। यही नहीं डॉ. सेन की पत्नी इलीना सेन अपने पति की रिहाई के समर्थन में वैश्विक मानवाधिकारवादियों को लामबंद करने में जुटी हैं। इसी कारण सेन की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान यूरोपीय यूनियन के कार्यकर्ता भी न्यायालय परिसर में मौजूद थे। इन लोगों को रायपुर और बिलासपुर में विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा था। 40 नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित विश्व के कई मानवाधिकारवादी कार्यकर्ताओं ने सेन को छोड़े जाने का अनुरोध किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, सवाल यह नहीं है कि हर दोषी अपने को बेगुनाह बताता है और स्वयं को निर्दोष साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता है, बल्कि यह है कि अपने जिस नजरिये और गतिविधियों को ये लोग क्रांति कहते हैं उसको खुले मन से स्वीकार करने को भी तैयार नहीं हैं। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-7xPuWi0DTkQ/TVvTDBddSGI/AAAAAAAAAjk/W-_X_a6wRE0/s1600/DR.%2BBINAYAK%2BSEN.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 249px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-7xPuWi0DTkQ/TVvTDBddSGI/AAAAAAAAAjk/W-_X_a6wRE0/s320/DR.%2BBINAYAK%2BSEN.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5574281012686178402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पराधीन भारत में सरदार भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल; जैसे हजारों सेनानी सीना ठोंककर अपने किए को स्वीकार करते थे। वे इस मातृभूमि के लिए हर वक्त अंग्रेजों की लाठी-गोली भी खाने को तैयार रहते थे। उन्होंने अंग्रेजों की दरिंदगी के खिलाफ बोला। अंग्रेजों के इस धरती से वापस चले जाने के पक्ष में सतत आवाज उठाई। उनके चेहरे पर थोड़ा भी शिकन या मायूसी का भाव नहीं रहता था। हर सजा को उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। चूंकि उन लोगों का अभियान देश की रक्षा के लिए था, इसलिए वे लोग अंग्रेजी अदालतों से मिली हर सजा को भुगतने के लिए तैयार रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन डॉ. सेन और उनके समर्थकों को न्यायालय के हर फैसले पर आपत्ति है। यदि न्यायालय ने साक्ष्यों व तथ्यों को नजरअंदाज करके उनको जमानत पर रिहा कर दिया होता तो शायद वे प्रसन्न हो जाते औऱ न्यायालय के फैसले की भूरि-भूरि प्रशंसा करते। हालांकि यह गलती सेन की नहीं बल्कि उनके वैचारिक रास्ते की है, जो केवल अपने पक्ष में आए फैसले को ही न्याय मानती है। यही है साम्यवाद और नक्सलवाद की कथा-व्यथा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-4851878989320115499?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/4851878989320115499/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=4851878989320115499&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4851878989320115499'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/4851878989320115499'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='विनायक सेन के बहाने......'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-8di4LF0CRIQ/TVvTbwDlWqI/AAAAAAAAAjs/ekwQykd-qwI/s72-c/Bilaspur%2BHC%2B1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-2811649741236428982</id><published>2011-01-29T19:39:00.007+05:30</published><updated>2011-01-30T17:37:47.071+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><title type='text'>डरपोक थे पंडित नेहरू : डॉ. टेंग</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TUQhD0LQhcI/AAAAAAAAAik/-H1qQRRpG5o/s1600/Proff%2BMK%2BTeng.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 232px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TUQhD0LQhcI/AAAAAAAAAik/-H1qQRRpG5o/s320/Proff%2BMK%2BTeng.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5567611388765963714" /&gt;&lt;/a&gt;डॉ. मोहन कृष्ण टेंग कश्मीर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे दिसम्बर 1991 में विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर समस्या का गहनतम अध्ययन किया है। उनकी कश्मीर मामले पर कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं; जिनमें- कश्मीर अनुच्छेद-370, मिथ ऑफ ऑटोनामी, कश्मीर स्पेशल स्टेटस, कश्मीर : कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री एंड डाक्यूमेंट्स, नार्थ-इस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया प्रमुख हैं। उनका मानना है कि कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे पंडित नेहरू और भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा न फहराने देने के प्रति उमर सरकार की प्रतिबद्धता और केंद्र सरकार की अपील को भी वे उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि दोनों सरकारों का यह रवैया भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ है। डॉ. टेंग पिछले सप्ताह जम्मू के अम्बफला स्थित कारगिल भवन में आयोजित जम्मू-कश्मीर : तथ्य, समस्याएं और समाधान विषयक दो दिवसीय सेमीनार में हिस्सा लेने आए थे। इसका आयोजन जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र ने किया था। इस दौरान &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt; ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है अंश-&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय के संबंध में उमर अब्दुल्ला के बयान पर आपका क्या कहना है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; हां, मैंने भी सुना था। राज्य विधानसभा में सशर्त विलय की बात उमर ने कही थी। लेकिन ऐसा कोई समझौता तो नहीं हुआ था। विलय का अधिकार राज्यों के राजाओं को था। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जो एकदम पूर्ण था। यह विलय अन्य राज्यों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था। गवर्नर जनरल ने उसको स्वीकार भी कर लिया था। विलय के हस्ताक्षर होने में नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं की कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही उस समय के प्रजा मंडल के सदस्यों की भी कोई भूमिका नहीं थी। हालांकि 3 अक्टूबर को श्रीनगर में हुई नेशनल कान्फ्रेंस की बैठक में शेख ने विलय का समर्थन करने का फैसला लिया था। यह जनता की राय थी लेकिन इस बात को उन्होंने उजागर नहीं किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विलय पत्र का जो मसौदा तैयार किया गया था उसमें किसी अंग्रेज की भूमिका नहीं थी; बल्कि गृह मंत्रालय ने तैयार किया था। इस मंत्रालय के प्रमुख सरदार पटेल थे। अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पटेल को राज्यों के विलय का विशेष जिम्मा सौंपा था। विलय का यही मसौदा वी.के. कृष्ण मेनन और माउंटबेटन को सौंपा गया था। नेशनल कांफ्रेस के किसी भी नेता को विलय की ठीक से जानकारी नहीं थी। भारत सरकार ने शेख अब्दुल्ला के दिल्ली पहुंचने से पहले ही उस फाइल को बंद कर दिया। शेख पंडित नेहरू से मिले, उनके जान के लाले पड़े हुए थे। शेख ने कहा कि किसी भी तरह से आप जम्मू-कश्मीर में सेना भेज दीजिए, विलय जैसे भी करना है आप कर लें, लेकिन जल्दी सेना भेजें, नहीं तो बहुत लोग मारे जाएंगे। जबकि विलय की प्रक्रिया पूर्ण कर फाइल बंद कर दी गई थी। इसके बावजूद आज नेशनल कांफ्रेंस इस बात को बार-बार दुहरा रही है कि सशर्त विलय हुआ था। उनका यह दावा सरासर झूठ है। उस वक्त इसकी तो बात ही नहीं हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. क्या संविधान में अनुच्छेद-370 शामिल करने के पीछे विलय की भी कोई भूमिका है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; अरे भई, 26 अक्टूबर 1947 को ही विलय का कार्य पूर्ण हो चुका था। विलय से अनुच्छेद-370 का कोई संबंध नहीं है। झगड़ा तो विलय के दो वर्ष बाद यानी 1949 में शुरू हुआ। वर्ष 1949 के मध्य तक संविधान सभा ने अपना कार्य लगभग पूर्ण कर लिया था। लेकिन यह समस्या उठ खड़ी हुई कि राज्यों का क्या किया जाए। अन्य राज्यों के विलय का मसला अभी पूर्ण नहीं हुआ था। इसको सुलझाने के लिए जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों की दिल्ली में एक बैठक हुई थी। इन राज्यों का कहना था कि यदि यही कहा जाता रहा कि विलय की प्रक्रिया पूरी हो, उसके बाद संविधान सभा बने, तो इस प्रक्रिया में 10 साल लग जाएंगे। विदित हो कि गृह मंत्रालय ने इन राज्यों के लिए अलग संविधान सभा की वकालत की थी। इस बैठक में इन राज्यों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए भारत सरकार को संविधान बनाने के लिए अधिकृत कर दिया। इस दौरान यह तय हुआ कि उन राज्यों के शासक घोषणा-पत्र के जरिए इस निर्णय पर अपनी मुहर लगाएं। भारत के हर राज्य के शासकों ने यह निर्णय स्वीकार किया कि भारत की संविधान सभा जो संविधान बनाएगी, उन्हें मंजूर होगा। उन शासकों में महाराजा हरिसिंह भी थे जिन्होंने ऐसी घोषणा की कि भारतीय संविधान सभा के द्वारा बनाया गया संविधान उन्हें मंजूर होगा। ये सारी बातें भारतीय अभिलेखागार में मौजूद हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के लोगों ने यहां पर रोड़ा अटकाया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय हमें मंजूर नहीं हैं। हम अपनी संविधान सभा में अपना संविधान बनाएंगे। हम भारतीय संविधान की कोई बात स्वीकार नहीं करेंगे। जबकि इन्सट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में राज्यों के विलय कर लेने के बाद भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करना प्रमुख रूप से शामिल था। गृह मंत्रालय ने 14 मई 1949 को नेशनल कान्फ्रेंस के नेताओं को दिल्ली बुलाया। मंत्रालय ने कहा कि विलय के मुताबिक आपको भारतीय संविधान की मूलभूत बातें स्वीकार करनी होंगी। नेशनल कान्फ्रेंस ने कहा कि हमें भारतीय संविधान की एक बातें भी स्वीकार नहीं होंगी। असल में झगड़ा यहीं से शुरू हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. यदि भारत सरकार नेशनल कान्फ्रेंस की बातें नहीं मानती तो क्या होता?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; कुछ नहीं होता। विलय की प्रक्रिया नेशनल कान्फ्रेंस के रोड़ा अटकाने से दो वर्ष पहले ही पूरी हो चुकी थी। विलय को नेशनल कान्फ्रेंस को मानना ही पड़ता। लेकिन सरकार ने उसको झूठ में महत्व दिया। अगर सरकार ने ये बातें नहीं मानी होतीं तो देश के ऊपर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। इसको लेकर नेहरू क्यों घबरा गए थे, यह समझ से परे है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. पंडित नेहरू कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए कहां तक जिम्मेदार हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; 21 अक्टूबर 1947 को छद्म पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया। 22 तारीख को सुबह पांच बजे पाकिस्तानी सेना पूरे मुजफ्फराबाद में फैल चुकी थी। इस संदर्भ में भारत सरकार का कहना था कि इसकी सूचना उसे 26 तारीख को मिली। जबकि 22 तारीख को 10.30 बजे प्रधानमंत्री के टेबल पर पाकिस्तानी सेना के दाखिले की सूचना लिखित रूप से पहुंच चुकी थी। इसके बावजूद अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की हिम्मत नहीं थी कि वे गवर्नर जनरल से बातचीत करते। इसकी चर्चा दूसरे दिन लंच मीटिंग के दौरान हुई।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. तो आपका कहना है कि पाकिस्तानी आक्रमण के खिलाफ नेहरू ने फैसला लेने में पांच दिन लगा दिए?  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; हां, यदि उन्होंने सूचना मिलने के तुरंत बाद इसके खिलाफ कार्रवाई की होती; तो न पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की समस्या उत्पन्न होती और न ही इस आक्रमण में इतने लोग मारे गए होते। इन पांच दिनों में 38 हजार लोग मारे गए। इसमें हिंदू, सिख और अंग्रेज शामिल थे। आप कल्पना कर लीजिए, यह कोई छोटी बात नहीं है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यही नहीं नेहरू ने दूसरी बड़ी गलती यह की कि एक ओर जब भारतीय सेना पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को खदेड़ रही थी तो बीच में ही जीती हुई लड़ाई को वे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। उनमें लड़ने की हिम्मत नहीं थी, वह डरपोंक थे।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. क्या अनुच्छेद-370 भारत की सम्प्रभुता के खिलाफ है? &lt;/span&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; इससे भारत का कोई हित नहीं जुड़ा है। यह देश की सम्प्रभुता के खिलाफ है ही; लोकतंत्र और सेकुलरिज्म की मूल भावना के भी खिलाफ है। सबसे प्रमुख बात यह है इसके कारण नागरिकों के मूलाधिकार, नागरिकता का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का अधिकार-क्षेत्र स्वीकार नहीं है।    &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. अनुच्छेद-370 हटाने से कश्मीर समस्या समाप्त हो जाएगी, आपका क्या कहना है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; जम्मू-कश्मीर की समस्याएं हिंदुस्तान की सारी समस्याओं का एक प्रमुख हिस्सा है। दूसरी बात यह है कि कम से कम एक जो अनिश्चितता है वो तो खत्म हो जाएगी। भारतीय संविधान की दृष्टि से समानता के साथ ही जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य राज्यों के नागरिकों के बीच भी समानता आ जाएगी। जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी नहीं रह जाएगी। दो विधान और दो निशान खत्म हो जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. क्या भारतीय संसद अनुच्छेद-370 को समाप्त कर सकती है? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; हां, वह ऐसा कर सकती है। यह अनुच्छेद-370 भारतीय संविधान में अस्थाई संक्रमणकालीन विशेष उपबंध के रूप में शामिल किया गया था; फिर हटाने में कोई समस्या नहीं है। संसद के पास संशोधन और अभिनिषेध; दोनों करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए हमारे नेताओं के पास दृढ़-इच्छाशक्ति का अभाव है, नहीं तो यह समस्या कभी की समाप्त हो जाती। संसद केवल संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं जा सकती। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. कश्मीर की वर्तमान समस्या के पीछे क्या आप अमेरिका की भी कोई भूमिका देखते हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; नहीं, अमेरिका की कोई भूमिका नहीं है। मेरा मानना है कि पहले भी कोई भूमिका नहीं रही है। पाकिस्तान को छोड़कर किसी अन्य देश की ऐसी कोई भूमिका नहीं है। इस समस्या के पीछे भारत का राजनैतिक प्रतिष्ठान ही मूल रूप से जिम्मेदार है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. लाल चौक पर तिरंगा न फहराने देने की उमर सरकार की प्रतिबद्धता कहां तक उचित है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; यह सरासर अनुचित और संविधान के विरूद्ध है। यही बात तो अलगाववादी भी कर रहे हैं। फिर सरकार और अलगाववादियों में क्या अंतर बचता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. लेकिन राज्य और केंद्र की सरकार एक स्वर में बोल रही थी कि तिरंगा फहराने से राज्य में काफी समय बाद स्थापित अमन-चैन बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; जहां तक तिरंगा फहराने की बात है तो केवल इतना ही होता न कि दो चार आतंकवादी आ जाते और गोली चलाकर कुछ लोगों को मार डालते, इससे ज्यादा तो कुछ नहीं होता। इसके बावजूद भाजपा कार्यकर्ताओं को तिरंगा फहराने नहीं दिया गया। वे तो प्राणों की आहुति देने को भी तैयार थे। उन्हें पठानकोट और माधवपुर में रोक दिया गया। क्या आप अमन-चैन के बहाने राष्ट्र-ध्वज को फहराने से किसी को रोक सकते हैं? दरअसल भारत सरकार के पास कोई साहस ही नहीं है; नहीं तो कोई कड़ा कदम उठाती।&lt;br /&gt;                                                 &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों का दल कश्मीर समस्या को सुलझाने की दिशा में क्या कुछ आवश्यक पहल कर पाएगा, आपको क्या लगता है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans. &lt;/span&gt;सबसे मुख्य बात है कि वार्ताकारों में किसी को भी जम्मू-कश्मीर की स्थानीय भाषा की जानकारी नहीं है। फिर ये त्रि-सदस्यीय वार्ताकार स्थानीय लोगों की भाषा कैसे समझते होंगे। मुझे तो इसी बात पर हैरानी हो रही है। राज्य के संदर्भ में आवश्यक पहल तो दूर की कौड़ी है।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. जम्मू-कश्मीर से संबंधित आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटाने या इसके नियमों में ढील देने की मांग उठती रहती है, कहां तक उचित है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Ans.&lt;/span&gt; कुछ नहीं, यह केंद्र और राज्य सरकार कर रही है। ये बेकार का प्रोपेगंडा है। यदि इसमें संशोधन होगा तो सेना के पास कार्य करने का कोई रास्ता नहीं बचेगा, उसके हाथ बंध जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-2811649741236428982?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/2811649741236428982/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=2811649741236428982&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2811649741236428982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/2811649741236428982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html' title='डरपोक थे पंडित नेहरू : डॉ. टेंग'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TUQhD0LQhcI/AAAAAAAAAik/-H1qQRRpG5o/s72-c/Proff%2BMK%2BTeng.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-5383318361113464887</id><published>2011-01-06T14:14:00.005+05:30</published><updated>2011-01-06T14:20:56.719+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><title type='text'>सूरीनाम में सूर्य कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष श्री रामधनी से बातचीत-</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TSWBtw0OFaI/AAAAAAAAAiU/IRK4VVD1z6U/s1600/Surinaam%2BKumbh%2Blogo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 171px; height: 160px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TSWBtw0OFaI/AAAAAAAAAiU/IRK4VVD1z6U/s200/Surinaam%2BKumbh%2Blogo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5558991938256770466" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम में 14 जनवरी से सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्घाटन वहां के राष्ट्रपति श्री देसी बोतरस करेंगे। देश की राजधानी पारामारीबो में सूरीनाम नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस कुंभ मेले का समापन 18 फरवरी को होगा। देश के इतिहास में इस प्रकार के मेले का आयोजन पहली बार हो रहा है। इसको लेकर सूरीनाम के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, फ्लोरिडा, नीदरलैंड; आदि देशों के हिंदुओं में काफी उत्साह है। इस पर्व में भारत और सूरीनाम सहित दुनिया के सैंकड़ो विद्वान हिस्सा लेंगे। इस संदर्भ में पवन कुमार अरविंद ने नई दिल्ली से सूरीनाम में दूरभाष पर “सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति” के अध्यक्ष श्री महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी से बातचीत की है। प्रस्तुत है अंश- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. कुम्भ पर्व के आयोजन की प्रेरणा आपको कहां से मिली?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. इसकी प्रेरणा मुझे आचार्य शंकर से मिली। आचार्य जी सूरीनाम के कारीगांव के निवासी हैं। वह हालैंड व सूरीनाम में सनातन धर्मसभा के अध्यक्ष हैं। उन्होंने ही मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया। समय-समय पर उनसे आवश्यक सुझाव भी मुझे मिलता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. इसके आयोजन का स्वरूप क्या है? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. इस आयोजन में सभी लोगों का हार्दिक स्वागत है। हमें उम्मीद है कि इसमें सूरीनाम के बाहर के लोग भी भारी संख्या में हिस्सा लेंगे। सूरीनाम व भारत के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, गुयाना, फ्लोरिडा, नीदरलैंड समेत दुनिया के कई देशों के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है, जो विश्व में सुख-शांति की स्थापना और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार सहित कई गंभीर विषयों पर चिंतन-मंथन करेंगे। &lt;br /&gt;पर्व के दौरान सूरीनाम के सभी मंदिरों से कलश पूजन करके कुंभ परिसर में लाया जाएगा। कलश पूजन में हिस्सा लेने वाले लोग कुंभ के दौरान भजन-कीर्तन भी करेंगे, ऐसी योजना बनाई गई है। इस दौरान श्रद्धालु वैरागी अखाड़ा के भारतीय संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद जी महाराज के प्रवचन का आनंद भी उठा सकते हैं। वे पिछले कई वर्षों से विदेशों में रामकथा व भागवतकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय हैं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. कुंभ मेला भारत में लगता है, फिर सूरीनाम में आप क्यों आयोजित कर रहे हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. हम लोग भारतीय मूल के हैं। हमारे पूर्वज आज से करीब 170 वर्ष पूर्व गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम और त्रिनिडाड; आदि देशों में आए थे। भारतीय मूल का होने के कारण वहां की संस्कृति और सभ्यता से गहरा जुड़ाव है। सूरीनाम की जनसंख्या करीब पांच लाख है, जिसमें करीब 38 प्रतिशत हिंदू हैं। भारत में जो कुंभ लगता है उसका बहुत बड़ा महत्व है। उसके आयोजन का महात्म्य समुद्र मंथन से जुड़ा है। भारत में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में हर बारहवें एवं छठवें वर्ष क्रमशः कुंभ व अर्द्धकुंभ मेले का आयोजन होता है। इन आयोजनों में विश्व भर के लाखों लोग हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा ऐसे भी लोग हैं जिनको आर्थिक कारणों से भारत पंहुचना संभव नहीं हो पाता। उनके लिए इसके विकल्प के तौर पर सूरीनाम में कुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है। मुझे विश्वास है कि यह आयोजन उन सभी प्रवासी भारतीयों के लिए एक वरदान साबित होगा, जो भारत पंहुच कर माघ स्नान का पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TSWB0G091PI/AAAAAAAAAic/IEdeH0JaXoE/s1600/MPR%2BRamdhani.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 188px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TSWB0G091PI/AAAAAAAAAic/IEdeH0JaXoE/s200/MPR%2BRamdhani.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5558992047244694770" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. इसके आयोजन का क्या उद्देश्य है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. सूरीनाम में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार ही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसके अलावा सनातन धर्म को मानने वाले दुनिया के सभी साधु-संत और विद्वान एक जगह एकत्रित होकर विश्व के लिए सुख शांति का मार्ग खोज सकें, भी उद्देश्य है। इसके आयोजन के लिए ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती समेत कई संतों ने शुभकामनाएं दी हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. विश्व शांति में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का क्या योगदान है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. मेरे विचार से भारतीय संस्कृति और सभ्यता को ही सनातन धर्म कहा जाता है। दुनिया में इसके प्रचार का उद्देश्य सभी मत, पंथ और सम्प्रदाय के लोगों में एकता स्थापित करना है। मुझे यह विश्वास है कि सनातन धर्म सत्य पर आधारित है और सत्य की स्थापना से ही विश्व में शांति की स्थापना हो सकेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. अपने बारे में कुछ बताइए?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans.  मेरी पैदाइश और शिक्षा-दीक्षा सूरीनाम में हुई। शिक्षा के बाद मैंने व्यापार शुरू किया। ईश्वर की कृपा से मेरा व्यवसाय ठीक चल रहा है। समाजिक कार्यों को करने से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। इसलिए जब तक शरीर में सांस है, करते रहने का प्रयास करता रहूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-5383318361113464887?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/5383318361113464887/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=5383318361113464887&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5383318361113464887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/5383318361113464887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='सूरीनाम में सूर्य कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष श्री रामधनी से बातचीत-'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;दुनिया की कोई भी विचारधारा हो, यदि वह समग्र चिंतन पर आधारित है और उसमें मनुष्य व जीव-जंतुओं सहित सभी प्राणियों का कल्याण निहित है; तो उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है। इस पृथ्वी पर साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके संदर्भ में गभीर चिंतन-मंथन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसके प्रेरणा पुरुषों ने यह नया वैचारिक रास्ता खोजते समय समग्र चिंतन नहीं किया। मात्र कुछ समस्याओं के आधार पर और वह भी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर, इस रास्ते को खोजा। यही कारण है कि साम्यवाद एक कृत्रिम विचारधारा के सदृश प्रतीत होती है। यदि दुनिया में इस विचारधारा का प्रभाव और उसके अनुयायियों की संख्या तेजी से घट रही है तो फिर अनुचित क्या है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक; कोई भी विचारधारा रही हो, उसका सदा-सर्वदा से यही कार्य रहा है कि वह समाजधारा को अपने अनुकूल करे। लेकिन यह कार्य बड़ा कठिन है या यूं कहें कि यह तपस्या के सदृश है। इस कठिन तपस्या के डर से लोग शार्ट-कट अपनाते हैं। समाज के लोगों को शीघ्र जुड़ता न देख साम्यवाद का झंडा लेकर चलने वाले अधीर कार्यकर्ताओं ने एक नए विकल्प की तलाश की। इन्हीं शार्ट-कट की परिस्थितियों में नक्सलवाद का जन्म हुआ। साम्यवाद ही नक्सलवाद की बुनियाद है।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियां आती हैं कि पुत्र जब ज्यादा बिगड़ जाता है तो पिता लोक-लाज के भय से उसको अपना मानने से ही इन्कार कर देता है। ठीक वैसी ही स्थिति साम्यवाद और नक्सलवाद के साथ है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;साम्यवाद का बिगड़ैल (Spoiled) पुत्र है नक्सलवाद! साम्यवाद के कर्ता-धर्ता भले ही इससे इन्कार करें, लेकिन सत्य भी यही है। नक्सलवाद की नींव में साम्यवादी ईंट का जमकर प्रयोग हुआ है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज नक्सलवाद देश के लिए विध्वंसक साबित हो रहा है। इन कथित क्रांतिकारियों की गतिविधियों से देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। सुरक्षाबल और पुलिस के सैंकड़ों जवानों सहित अनगिनत निर्दोष लोग; इस कथित आंदोलन के शिकार हुए हैं। इन्हीं खूनी नक्सलियों का समर्थन करने वाले व उनकी गतिविधियों में सहायक की भूमिका निभाने के आरोप में डॉ. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने 24 दिसम्बर को देशद्रोही करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। डॉ. सेन के साथ प्रतिबंधित नक्सली नेता नारायण सान्याल और कोलकाता के व्यवसायी पीयूष गुहा को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRsjkuuHtCI/AAAAAAAAAh4/h0DtqtWM7TI/s1600/Binayak%2BSen.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRsjkuuHtCI/AAAAAAAAAh4/h0DtqtWM7TI/s320/Binayak%2BSen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5556073679215375394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदित हो कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाए गए सलवा जुडूम नामक अभियान के खिलाफ डॉ. सेन काफी मुखर रहे हैं। यह अभियान नक्सलियों के सफाए के लिए चलाया गया था। उन्होंने इस अभियान के खिलाफ धरती-आसमान एक कर दिया था। डॉ. सेन पेशे से चिकित्सक एवं ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबरटीज’ की छत्तीसगढ़ इकाई के महासचिव हैं। वे मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में ज्यादा चर्चित हैं। इस बात की भी प्रबल संभावना है कि उन्होंने चिकित्सा की आड़ में भोले-भाले गरीब आदिवासी व वनवासियों को नक्सलवाद से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उन्होंने जेल में बंद नक्सली नेता नारायण सान्याल के लिए व्यक्तिगत पोस्टमैन की भूमिका अदा की और जेल अधिकारियों के पूछने पर उनका उत्तर रहता था कि “मैं तो सान्याल के घर का हूं, उनका हालचाल जानने आया हूं।” लेकिन यह झूठी सूचना ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. सेन के संदर्भ में वामपंथी वुद्धिजीवियों और अंग्रेजी मीडिया के एक वर्ग को अदालत का यह फैसला नागवार गुजरा है। इन्हीं वुद्धिजीवियों में से कुछ ने सोमवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया और उनकी रिहाई की मांग की। वामपंथी प्रदर्शनकारियों का कहना था कि डॉ. सेन को जबरन फंसाया गया है। वे यह कतई मानने को तैयार नहीं है कि यह अदालत का फैसला है और इसके बाद अभी ऊपरी अदालतों का फैसला आना शेष है। आखिर सत्र न्यायालय के फैसले के आधार पर ही सेन साहब को दोषी कैसे मानलिया जाए ? तो फिर ये वामपंथी चिंतक इतने अधीर क्यों हैं ? उनको धैर्य पूर्वक शीर्ष अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए। जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, सेन साहब सचमुच निर्दोष हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वामपंथी बुद्धिजीवियों को भारतीय न्यायिक प्रणाली के तहत अब तक हुए निर्णयों पर भी ध्यान देना चाहिए। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज तक कभी भी कोई निर्दोष व्यक्ति कठोर सजा का भागी नहीं हुआ है। भारतीय न्याय प्रणाली की यह एक बहुत बड़ी विशेषता है। यही विशेषता उसकी रीढ़ है। भले ही न्याय देर से क्यों न मिले लेकिन इस देरी के पीछे मुख्य कारण यह है कि कोई निरपराध व्यक्ति न्यायालय की तेजी का शिकार न हो जाए।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर वामपंथी वुद्धिजीवी इतने अधीर क्यों हो रहे हैं ? उनको न्याय प्रणाली पर भरोसा रखना चाहिए। उनको यह भी विश्वास करना चाहिए कि यदि वास्तव में डॉ. सेन ने देशहित का कार्य किया है तो अंतिम न्यायालय का निर्णय अन्यायपूर्ण नहीं होगा। लेकिन जिस प्रकार वामपंथी वुद्धिजीवियों ने कानून का उपहास किया है और फैसले पर आपत्ति की है, वह स्वस्थ परम्परा का द्योतक नहीं कहा जा सकता है। कानून का उपहास करना और न्यायप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना देश की सम्प्रभुता के खिलाफ माना जाना चाहिए। धीरे-धीरे यही कदम देश की सम्प्रभुता के समक्ष मजबूत चुनौती पेश कर सकती है। इसलिए खतरनाक है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-6031211656788232478?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/6031211656788232478/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=6031211656788232478&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/6031211656788232478'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/6031211656788232478'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2010/12/blog-post_29.html' title='साम्यवाद का बिगड़ैल पुत्र है नक्सलवाद !'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRsju8j8hEI/AAAAAAAAAiA/Yjrv0mjaLwc/s72-c/Maoist.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-3721667289089220385</id><published>2010-12-23T20:30:00.005+05:30</published><updated>2010-12-23T20:40:18.604+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गांधीवाद और गांधीत्व में बड़ा फर्क है'/><title type='text'>गांधीवाद और गांधीत्व में बड़ा फर्क है</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;देखो भई;&lt;/span&gt; जब भ्रष्टाचार करना हो तो कम से कम गांधी टोपी को उतार दिया करो। गांधी टोपी को पहन कर ही ऊल-जुलूल हरकतें करना और नीयत में खोट लाना, गांधी को गाली देने के ही बराबर है। यह सरासर अनुचित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर देश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी से भ्रष्टाचारियों का क्या सम्बंध है ? समझ में नहीं आता कि गांधी के नाम की टोपी को बार-बार भ्रष्टाचार की काली करतूतों के पीछे क्यों घसीटा जाता है। जब किसी भ्रष्टाचारी नेता का कार्टून बनाना हो, कांग्रेस के विरोध में किसी नेता का पुलता फूंकना हो और ऐसे ही अन्य मौकों पर गांधी टोपी का प्रयोग जरूर किया जाता है। आखिर ऐसा क्यों है ? हालांकि ऐसा सभी कार्टूनों में नहीं होता। फिर भी ज्यादातर भ्रष्टाचारी नेताओं के कार्टूनों में गांधी टोपी का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करना उनके विचारों को चिढ़ाने वाला ही प्रतीत होता है। क्या गांधी जी और भष्टाचार को आप एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं? गांधी जी ने जीवन भर आत्मपरिष्कार और सुचिता पर विशेष ध्यान दिया और त्याग, सत्य व अंहिसा का अनूठा उदाहरण समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। फिर भी उनकी टोपी को सरेआम क्यों नीलाम किया जा रहा है। यह किसी के भी समझ से परे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, गांधी टोपी से कांग्रेस का भी कोई सम्बंध नहीं है। क्योंकि उसने स्वतंत्रता के तत्काल बाद गांधी को नजरअंदार कर दिया था। गांधी ने कहा था कि अब तो देश स्वतंत्र हो चुका है; लिहाजा इस कांग्रेस नामक संस्था को भंग कर दिया जाए। क्योंकि यह कांग्रेस आजादी की लड़ाई लड़ने का एक सामूहिक मंच थी। इस मंच से सभी विचारधाराओं के लोगों का जुड़ाव था। लेकिन इस संदर्भ में कांग्रेसियों ने गांधी की बात नहीं मानी और आजादी के बाद से ही गांधीत्व को ठोकर मारनी शुरू कर दी थी। दरअसल, गांधी को यह आशंका थी कि स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सेदारी की ढोल पीटकर कांग्रेस अपने नाम का दुरुपयोग कर सकती है। इसलिए कांगेस नामक संस्था को भंग करने के लिए गांधी ने बार-बार आग्रह किया।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRNld5u7LQI/AAAAAAAAAhc/LvKiqTQcihk/s1600/JL%2BNehru.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 273px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRNld5u7LQI/AAAAAAAAAhc/LvKiqTQcihk/s320/JL%2BNehru.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553894329866202370" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;वैसे गांधी जी कोई भगवान नहीं थे कि उनके अंदर एक भी दोष न हों, वह भी आदमी ही थे। इसलिए जीवन में उनसे भी कई गलतियां जरूर हुई होंगी। इस संदर्भ में यदि देखा जाए तो ‘गांधीत्व’ और ‘गांधीवाद’ में बड़ा फर्क है। ‘गांधीवाद’ जहां गांधी जी के जीवन के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं पर आधारित विचारों का समुच्चय है, वहीं ‘गांधीत्व’ शब्द का अभिप्राय केवल सकारात्मक तत्व और उसके समुच्चय से है। यानी गांधी के सम्पूर्ण जीवन पर आधारित विचार को गांधीवाद का नाम दिया जा सकता है। जबकि उनके सम्पूर्ण जीवन के केवल सकारात्मक पहलुओं पर आधारित विचार को गांधीत्व के नाम से पुकारा जा सकता है। अर्थात; गांधीवाद का सकारात्मक पक्ष ही गांधीत्व है। गणित की भाषा में कहें तो गांधीवाद विचारों का एक समुच्चय है; जबकि गांधीत्व उसका उप-समुच्चय। लेकिन यह उप-समुच्चय होते हुए भी गांधीवाद रूपी समुच्चय से काफी बड़ा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी टोपी पहनने के बाद व्यक्ति की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है; क्योंकि यह केवल टोपी नहीं बल्कि एक विचार का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी टोपी पहनना यानी ‘गांधीवाद’ नहीं बल्कि ‘गांधीत्व’ का आचरण करना है। लेकिन वर्तमान कांग्रेसी एक ऐसे गांधी टोपी को धारण किए हैं जिसका न तो गांधीवाद से कोई संबंध है और न ही गांधीत्व से। हालांकि कांग्रेस में गांधीत्व का आचरण करने वाले नेताओं की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन ऐसे लोग संगठन और सरकार में हाशिए पर रखे जाने के कारण दिखाई कम पड़ते हैं। ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं जो गांधी टोपी धारण नहीं करते; पर गांधी के पक्के भक्त हैं। ऐसे लोगों के लिए गांधी टोपी पहनने या न पहनने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि ऐसे लोगों का जीवन ही गांधीत्व का अनुपम उदाहरण है। ऐसे ही लोग गांधीत्व की रीढ़ हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल, गांधी टोपी धारण कर भ्रष्टाचार की अविरल गंगा प्रवाहित करने वाले नेताओं के आचरण से तो यही लगता है कि यह टोपी अब गांधी के विचार का नहीं बल्कि उनकी पार्थिव देह का प्रतीक बनकर रह गया है। यानी टोपी धारण करना केवल दिखावा भर है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा सोचिए, जो व्यक्ति या संगठन गांधी को पूर्ण रूपेण आत्मसात कर लेगा, उसको भ्रष्टाचार से कुछ भी लेना-देना रह जाएगा क्या ? वह भ्रष्टाचार पर मौन कैसे रह सकेगा ? यदि कांग्रेसजन गांधी को अपना लिए होते, तो ‘भ्रष्टाचार की अविरल गंगा’ प्रवाहित क्यों करते ? इसके पीछे मुख्य कारण गांधीत्व को अंगीकार न करना ही है। यदि आप गांधी के विचारों की बार-बार दुहाई देते हैं और गांधी टोपी भी पहनते हैं; फिर भी आप भ्रष्टाचार करने से बाज नहीं आए, तो इसका स्पष्टीकरण मात्र एक ही शब्द में किया जा सकता है कि आप ढपोरसंख हैं। आपके लिए गांधी टोपी केवल मलाई काटने व चाटने का एक यंत्र भर है। इसलिए अच्छा यही होगा कि गांधी को बदनाम मत करिए, उनको चैन की सांस लेने दीजिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-3721667289089220385?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/3721667289089220385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1599524149276215822&amp;postID=3721667289089220385&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3721667289089220385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1599524149276215822/posts/default/3721667289089220385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bharatshri.blogspot.com/2010/12/blog-post_23.html' title='गांधीवाद और गांधीत्व में बड़ा फर्क है'/><author><name>पवन कुमार अरविन्द</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08387317907418244334</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-ZJHfnPdu-Jo/Tb_rPNEnYUI/AAAAAAAAAnI/OSwyYlDs4rM/s220/Pawan%2BKumar%2BArvind.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TRNld5u7LQI/AAAAAAAAAhc/LvKiqTQcihk/s72-c/JL%2BNehru.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1599524149276215822.post-8104329511606383583</id><published>2010-12-15T12:04:00.010+05:30</published><updated>2010-12-22T20:49:23.666+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><title type='text'>श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद करने वाले श्री रामदेव कृष्ण से पवन कुमार अरविंद की बातचीत-</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TQhh1JkfO5I/AAAAAAAAAhU/mH2RlPplvRE/s1600/Ramcharitmanas.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 254px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_GIZROmnRPfM/TQhh1JkfO5I/AAAAAAAAAhU/mH2RlPplvRE/s320/Ramcharitmanas.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5550794106464058258" /&gt;&lt;/a&gt;भारतीय मूल के हालैंड निवासी अध्यापक व प्रसिद्ध नाट्यकर्मी श्री रामदेव कृष्ण ने तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद किया है। यह गद्य रुप में है। इसका लोकार्पण 14 जनवरी 2011 को सूरीनाम में पहली बार आयोजित होने वाले कुंभ मेले के दौरान वहां के राष्ट्रपति श्री देसी बोतरस द्वारा किया जाएगा। श्री रामदेव इस सप्ताह अपने त्रि-दिवसीय दौरे पर भारत आए थे। इस दौरान उन्होंने दिल्ली के संकटमोचन आश्रम में सोमवार (13 दिसम्बर) को आयोजित एक सादे समारोह में डच भाषा में अनूदित ग्रंथ की पाण्डुलिपि की सीडी विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल को सौंपी। इस कार्यक्रम के तत्काल बाद &lt;strong&gt;पवन कुमार अरविंद&lt;/strong&gt; ने श्री रामदेव से विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के अंश- &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस का डच भाषा में अनुवाद करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. श्रीरामचरितमानस के अनुवाद की प्रेरणा मुझे वैरागी अखाड़ा के संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद उपाख्य स्वामी ब्रह्मदेव से मिली। उन्होंने ही मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया और समय-समय पर आवश्यक सुझाव दिए, जिसके कारण आज ये संभव हो पाया है। स्वामी जी भारतीय संत हैं। उनका मुख्य आश्रम त्रिनिडाड में है। इसके अतिरिक्त अमेरिका, नार्वे, सूरीनाम, फ्लोरिडा; आदि देशों में भी आश्रम है। वे पिछले कई वर्षों से विदेशों में रामकथा व भागवतकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय हैं। &lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. अनुवाद के दौरान आपको भाषा की क्या-क्या दिक्कतें आईं ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. मैं अपने जीवन के 18-19 वर्षों तक हिंदी और डच भाषा नहीं जानता था। हिंदी में केवल हाँ और ना की ही जानकारी थी। डच भाषा को मैं राक्षसी भाषा मानता था। लेकिन यह जानकारी जब स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद जी को हुई; तो उन्होंने मुझे कहा कि शर्म करो, तुम भारतीय मूल के हो; फिर भी हिंदी नहीं जानते। स्वामी जी के इस कथन के बाद मैंने हिंदी के साथ डच भाषा भी सीखी। इसके बाद मैंने डच और हिंदी भाषा की एक किताब लिखी, ताकि डच लोग भी हिंदी सीख सकें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. डच भाषा की लिपि क्या है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. रोमन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. श्रीरामचरितमानस की विषय-वस्तु को जानने-समझने में यदि किसी और माध्यम या व्यक्ति ने आपकी मदद की हो, उसके बारे में बताइए ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. श्रीरामचरितमानस और उसके प्रमुख पात्र मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व को जानने-समझने में डीडी-1 चैनल पर प्रसारित होने वाले रामानंद सागर की प्रसिद्ध हिंदी धारावाहिक रामायण ने मुख्य भूमिका अदा की। रामानंद सागर के धारावाहिक को मैंने अपना गुरू माना। इसके पहले मैंने कभी रामायण नहीं पढ़ी थी। लेकिन धारावाहिक देखने के बाद मैं रामायण पढ़ने के लिए उत्सुक हुआ। जितनी बार पढ़ता, उतनी बार कुछ न कुछ नयी जानकारियां मिलीं। जिससे अनुवाद में काफी सहूलियत हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. अनुवाद का कार्य आपने कितने दिनों में पूरा किया ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. अनुवाद करने में कुल 20 महीने का समय लगा। मैं प्रतिदिन 18 घंटे कार्य करता था और शेष 6 घंटे सोने और नियमित दिनचर्या में लगाता था। इस दौरान मेरी पत्नी श्रीमती नसीम कृष्ण का विशेष सहयोग मिला। बिना उनके सहयोग के यह कार्य संभव नहीं था। वे कॉफी बना-बनाकर मुझे देती रहती थीं और मैं केंद्रित होकर अनुवाद के कार्य में लगा रहता था। अनुवाद के साथ ही पुस्तक के लिए लेआउट, तुलसीदास जी की पेंटिग्स, बजरंगबली की पेंटिग्स भी बनाया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. क्या आप श्रीरामचरितमानस के बाद भी किसी अन्य ग्रंथ या साहित्य का डच भाषा में अनुवाद करने की सोच रहे हैं ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. इसके बाद मैं तुलसीदास रचित एक अन्य साहित्य “वैराग्य संदीपनी” का डच भाषा में अनुवाद करुंगा। मेरा प्रयास होगा कि यह कार्य भी शीघ्र सम्पन्न हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que.  इसके अतिरिक्त आपकी और क्या योजनाएं हैं ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. मेरी योजना भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ी “फ्राम हे राम टू श्रीराम” नामक एक नाटक पर कार्य करने की है। यह तीन भागों में होगा। जिसमें इतिहास, रामचिरतमानस और महात्मा गांधी से जुड़ी विषय-वस्तु का समावेश होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Que. यह नाटक लिखने का आपका क्या उद्देश्य है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. इस नाटक के माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूं कि जब 150 से 170 वर्षों पूर्व हमारे पूर्वज गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम, हॉलैंड, त्रिनिडाड आदि देशों में आए तो क्या कारण था कि श्रीरामचरितमानस को भी साथ लाये। महात्मा गांधी ने क्यों मरते वक्त हे राम का उच्चारण किया था, आदि। इन सब बातों से जुड़े प्रश्नों का विस्तृत ढंग से वर्णन करूंगा। ताकि लोग राम के महत्व को आसानी से समझ सकें।&lt;br /&gt;  &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. इसके अलावा आपकी कोई और उपलब्धि हो, तो बताइए ? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; Ans. श्रीरामचरितमानस का अनुवाद कार्य शुरू करने से पूर्व मैंने रामलीला का आयोजन किया था, जिसमें सभी पात्र हिंदी में बोलते थे। मैं समझता हूं कि पात्रों का हिंदी में वाद-संवाद करना मेरी बड़ी उपलब्धि है। इसके अतिरिक्त हनुमान चालीसा का डच में अनुवाद करूंगा। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;Que. अपने बारे में कुछ बताइए ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ans. मेरी पैदाइश सूरीनाम में हुई। शिक्षा-दीक्षा सूरीनाम और हॉलैंड में हुई। मैं हॉलैंड के माडर्न स्कूल में अध्यापक हूं। मेरे पूर्वज भारतीय राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर के रहने वाले और मेरी पत्नी के पूर्वज कलकत्ता के निवासी हैं। वे लोग गिरमिटिया मजदूर के रूप में करीब 150 से 170 वर्षों पूर्व सूरीनाम और त्रिनिडाड गए थे और वहीं के होकर रह गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1599524149276215822-8104329511606383583?l=bharatshri.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bharatshri.blogspot.com/feeds/8104329511606383583/comments/default' title='टिप्प
